बढ़ती उम्र के साथ डिप्रेशन के खतरे से ये उपाय दिला सकते हैं राहत

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हेल्थ डेस्क, नई दिल्ली 23 जून 2022 मानसिक स्थिति के संतुलित रहने का मतलब है स्वस्थ जीवन की ओर बढ़ना। यह आज के समय में और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि अब इंसान एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा है। इस भागदौड़ में भावनात्मक स्तर पर असर पड़ना लाजमी है। जीवन में कई स्थितियां ऐसी होती हैं जो इंसान को निराशा की ओर धकेल सकती हैं। अगर कोरोना महामारी की ही बात करें तो इस दौर में लोगों ने अपनी जमा-पूँजी के साथ ही अपनी नौकरियां, अपने करीबी लोगों आदि को खोया है। इस सबका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। ऐसे में डिप्रेशन जैसी स्थिति का बनना सामान्य बात है। भावनात्मक उथल-पुथल किसी के भी साथ हो सकती है। कुछ लोग इस स्थिति को संभालने में सक्षम होते हैं और बहुत जल्दी, बिना किसी नुकसान के इससे बाहर आ जाते हैं, जबकि कई लोग ऐसे होते हैं जो इस उथल-पुथल में और गहराई में चले जाते हैं।
डिप्रेशन की यह स्थिति बढ़ती उम्र में भी बन सकती है।

रिटायरमेंट के बाद का धक्का 

शायद यह लोगों के लिए अजीब हो, लोगों को अक्सर लगता है कि डिप्रेशन उन लोगों को होता है जो किसी तकलीफ या मुश्किल से गुजरते हैं। यह एक भ्रान्ति है। डिप्रेशन की स्थिति कई बार ऐसे लोगों के साथ भी बनती है जिनका जीवन दिखने में सामान्य और आरामदायक होता है, जिनको धन, साधन या किसी भी चीज की कमी नहीं होती। आंकड़े बताते हैं कि रिटायरमेन्ट के बाद 80 प्रतिशत से अधिक लोग डिप्रेशन की ओर जाने लगते हैं। यह एक अनुमानित आंकड़ा है, तथ्य इससे कहीं ज्यादा भी हो सकता है। लेकिन इन सारे लोगों में डिप्रेशन के लक्षण गंभीर नहीं होते। इसलिए जीवन थोड़े बहुत उतार चढ़ाव के साथ चलता रहता है। इस समस्या का एक बड़ा कारण है लोगों का रिटायमेंट के बाद की जिंदगी को प्लान करके न रखना। जब एक दिन अचानक रूटीन बदल जाता है, हाथ में कोई काम नहीं रह जाता तो जिंदगी को धक्का सा लगता है। रोजमर्रा के सहयोगी, घर से दफ्तर के रास्ते में होने वाला घटनाक्रम आदि से सम्पर्क टूट सा जाता है और व्यक्ति  निराशा के भंवर में फंस सकता है। 

5 प्रतिशत को भी नहीं मिलता इलाज

एक सबसे बड़ी विडंबना है कि भारत में अब भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग भ्रांतियों और रूढ़ियों से बाहर नहीं आ पाए हैं। बढ़ती उम्र में मानसिक स्थिति में बदलाव और इसकी वजह से डिप्रेशन जैसी समस्या का होना आम बात है लेकिन इसके लिए इलाज तो क्या काउंसिलिंग तक इक्का-दुक्का लोग ही लेते हैं। भले ही सबके लिए यह गंभीर रूप न लेता हो लेकिन कुछ लोगों को इलाज, काउंसिलिंग आदि की जरूरत पड़ती है। इलाज न मिलने की वजह से डिप्रेशन गंभीर रूप ले लेता है। इसके पीछे एक वजह लक्षणों का न समझ आना भी होती है। युवाओं की अपेक्षा बुजुर्गों या अधिक उम्र वालों में डिप्रेशन का प्रभाव अन्य कई मेडिकल कंडीशन के साथ जुड़कर और भी जटिल रूप ले लेता है। इसकी वजह से न केवल शरीरिक समस्याओं जैसे ह्रदय संबंधी दिक्क्तों की आशंका बढ़ सकती है, बल्कि उनके इलाज को भी अलग तरह से प्लान करना पड़ता है। 

ये हो सकते हैं लक्षण

अधिक उम्र में या बुजुर्गों में डिप्रेशन के लक्षण कुछ अलग हो सकते हैं। उनमें जो लक्षण दिखाई देते हैं, वे इस प्रकार हो सकते हैं-
-पूरे समय थकान महसूस होन
-नींद आने में परेशानी आना
-चिड़चिड़ाहट होना या झुंझलाना
-असमंजस में रहना
-किसी भी काम या बात में ध्यान लगाने में मुश्किल आना
-पहले की तरह अपनी पसंद की किसी गतिविधि में उत्साह या रूचि न दिखाना
-भूख और वजन का कम होना
-चलने-फिरने, काम करने की गति का धीमा हो जाना
-दुखी, निराश महसूस करना 
-दर्द सहन करते जाना
-अधिक गंभीर स्थिति में आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचने के विचार मन में आना 
इन बातों पर दें ध्यान
-यदि आपके परिवार में डिप्रेशन पहले से मौजूद रहा है तो 50 वर्ष की उम्र के बाद परिवार के सदस्यों का नियमित परीक्षण अवश्य करवाएं 
-महिलाओं में मेनोपॉज की स्थिति के बाद डॉक्टर के परामर्श से काउंसिलिंग के सेशंस लें 
-रिटायरमेंट के बाद के लिए पहले से ऐसी गतिविधियों की योजना बनायें जो आपको रचनात्मक रूप से व्यस्त रखे। उदाहरण के लिए सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही किसी संस्था से जुड़ना, कोई कला सिखाने वाली संस्था की सदस्यता लेना, बागवानी या अपनी किसी हॉबी को पूरा करना, आदि। 
-यदि घर के किसी बुजुर्ग या बड़ी उम्र के सदस्य के व्यवहार में असामान्यता नजर आये तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। 
-यदि घर के बुजुर्ग अकेले रहते हैं, बच्चे घर से दूर हैं तो समय समय पर बुजुर्गों के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताने का प्रयास करें। दूरियां ज्यादा हों तो ऑनलाइन भी मीटिंग्स की जा सकती हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि बुज़ुर्गों को अपना होना व्यर्थ न लगे।
-डिप्रेशन का इलाज समय पर शुरू किया जाए तो काफी अच्छे परिणाम मिल सकते हैं लेकिन इसके लिए परिवार या मित्रों-शुभचिंतकों का साथ चमत्कारी असर भी डाल सकता है, यह बात ध्यान में रखें। 
-डिप्रेशन का इलाज लेते समय पहले से चल रही सभी दवाइयों की जानकारी डॉक्टर को अवश्य दें। इससे उन्हें दवाइयों के कॉम्बिनेशन तय करने में मदद मिलेगी क्योंकि कुछ अन्य दवाएं, डिप्रेशन की दवाओं के साथ मिलकर विभिन्न साइड इफेक्ट्स पैदा कर सकती हैं। 
-दवाइयों के साथ, फिजिकल एक्टिविटी का भी ध्यान रखें और रोज योगा, ध्यान, पैदल चलने जैसी गतिविधियों को जरूर अपनाएं। 
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: घटती-घटना की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को घटती-घटना के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। घटती-घटना लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है।


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