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लेख@ जोत-जँवारा अउ देवता-धामी

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जोत जलाय के परब चइत अउ कुँवार महीना मा आथे। जोत अउ जावरा मा अंतर हाबे, एक खाली जोत अउ दुसर जोत के संग मा जँवारा।
जोत ल बाहिर के देवी-देवता ल परसन करे बर जलाय जाथे अउ जोत -जँवारा ल अपन कुल के देवी-देवता ला भूल-चूक ल छिमा करे बर अर्जी -बिनती कर जलाय जाथे। एक जोत जँवारा गाँव के बस्ती माता खैरोदाई सीतला मा कभु -कभु जलाय जाथे। पहिली जँवारा बोके ही जोत जलाय के नियम रिहिस हे, खाली जोत जलाए के परचलन आजकल बाढ़त जावत हे। तभो ले आजो भी गाँव के बेवसथा म जवारा के संग ही जोत जलाय के नियम बनेच हे।
जँवारा काबर जँवारा कखरो घर या गाँव बस्ती के सीतला मा हर साल नइ बोए जाय। कखरो घरके देवी- देवता ला कोनो किसम के सेवा अर्जी मा कमी नजर आथे त माई घरके गोसइया या परिवार के बहु – बेटा ल सताय लगथे, सपना मा देव विधि – विधान के लकछन देखाथे। तहाँ ले सबो घर भरके बिचार करके जग रचना के जोरा करके जवारा बइठथे। ठीक इही किसम ले गाँव के सीतला जब रिसा जाथे ता हुम देवा, बईगा- गुनिया ला सपना मा तिरसुल, जोत जँवारा देखाके सताए लगथे। दुसर के देवी-देवता दुसर ला कभु नइ सता सके । शहर-नगर, दिल्ली, बॉम्बे, गोवा, कलकता के देवी देवता घर, गांव बस्ती ला नइ सताए।
जेन सताथे अउ घर ला साजथे तेने ला अपन देवी- देवता मानना चाहि। दंतेसीरी, बमलाई, महामाया, राजिम, भोरमदेव, अंगारमोती पुरा छत्तीसगढ़ ला नइ सताए। जेन इनकर ले सनबंधित (करीब) हे तिहि मनला ही सताही।
जोत जलाय के फइसन
आजकल कोनो देवी-देवता मा केठन जोत जलाए जाथे येकर कोनो निरधारन नइ हे। पुरातन अउ चलत चलागन मा देखे जाय ता एकेठन जोत ह मान्य हे। जगा- जगा हजारों जोत जलथे येकर पिछु लोगन के काय मानता हे समझ ले परे हे। लोगन संकलप, मनोकामना पूरती के नाव ले कहिंचो भी जोत जला लेथें। अपन- अपन आस्था बिसवास। आजकल तो घर मा नाग देव भिँभोरा पूजे ला जाय के चलन अघाते बढ़ गेहे। फेर बिन फोकट के नाव गइनता जोत जलई एक फइसन ढंग के लगथे। येकर ले शहर-नगर मा बने ट्रस्ट, समिति मनके बड़ फईदा हो जाथे। समिति मन जोत दान करेके परचार- परसार करथें। काकर जोत जलथे काकर बुझाथे पता नइ चले। कोनो -कोनो समिति मनतो जोत जलाए बर माँग घलोक करथें।
निमंत्रण जोत जवारा बोए के मिलथे, खाली जोत वाले मनके नइ मिलय। गाँव मनके देवी-
देवता बर कोनो ट्रस्ट समिति नइ लागे,सबो किसान जुरियाके सुमर -झुमर के माता के सेवा बजाथें। आजकल गाँव केमन शहरिया देवी-देवता देवता तीर जादा खिंचावत जावत हे। माने फइसन के जमाना हे, पुरातन के नहीं।
पॉवर अउ टॉवर के कमाल
जिहाँ जेकर टॉवर रइथे उनहाँ ओकर पॉवर रइथे। सिम बिना टॉवर के काम नइ करे कवरेज मिलना चाहि। जेकर परचार होथे ओकर बिसतार होथे। कभु-कभु बढि़या मोबाईल मा दुसर के सिम लगे ले बने काम नइ करे। सिम मा तको कंपीटेसन के जमाना हे । पुराना के जगा नवा सिम, टॉवर लगे ले जुन्ना ला बईठार देथे। बस अइसनेहेच के देवी देवता के हाल हे। घर मा सकती (पॉवर) देवी – देवता बिराजे हे लोगन ओकर टॉवर अउ पॉवर के इसतेमाले नइ करत हे, जेन दिन ओकर सिम, टॉवर के उपयोग होय लगही पॉवर ऑटोमेटिक बाढ़ जाहि। लोगन खुदे अपन कवरेज एरिया ले बाहिर चलत हे त बात कहां ले होय। लोगन कहिथे सबो एके आय.. अइसे कइसे होहि.? मोर बाप, तोर बाप नइ हो सकय…। आदमी सोंचें पहिली काय के सिम चलावत रिहिन अउ अब काके सिम चलावत हें। काकर आय ले काकर बंद होगे।
*बाजारवाद अउ देवता के परकार देवता दू परकार के होथे एक पोगरी (निजी) दुसर समिलहा (सरकारी) । पोगरी देवता ल माने
के अधिकार गाँव अउ घरवाले मनला होथे, समिलहा देवता जम्मो नागरिक बर होथे। गाँव के पोगरी देवता-धामी ल मनाय के दिन तिथि गाँव वाले मन तय करथें। समिलहा (सरकारी) देवता ला मनाय बर सरकार के तरफ ले छुट्टी घोसित करे जाथे।
घर अउ गाँव के देवता-धामी ला कोनो सरकारी अनुदान नइ मिलय अउ ना कोनो दान दक्छिना के परावधान हे। सरकारी देवी -देवता बर सरकारी बंदोबस्त, सासन परसासन के डहर ले करे जाथे।
घर अउ गाँव के देवी- देवता कोनो परचार मा सामिल नइ हे , जिनकर मुरती, फोटू ला बजार मा बेचें जा सके । आजतक ठाकुर देव, सीतला साड़हा देव, गढ़माता अउ तिरसूल, बाना, बैरग के दुकान नइ खोले गेहें। आजकल बजरहा देवी – देवता मनके चलन बढ़त जावत हे। जेन ला बिसाके लोगन अपन घरके पठेरा अउ कोठ मा चिपकाके पूजा घलोक करथें। बजरहा देवी-देवता के आय ले गाँव घरके देवी-देवता मा उलटा परभाव पड़त हे। गाँव बस्ती घर परिवार के देवी-देवता ले जादा शहर कोती के देवी-देवता के मान गउन बाढ़ गेहे। असली देवी-देवता परचार के वस्तु, खरीदी -बिकरी मा सामिल नइ हे।
बलिप्रथा (जीवाभाव)
छत्तीसगढ़, भारत मा जतेर भी बड़का देवी-देवता हे कोनो ना कोनो राजा महाराजा ले समबंधित हे। खोजके देखयँ। उनकर पाहरो मा जीव बलि देयके प्रथा रीहिस हे , सुनती मा आथे राजा मन अपन मानता के देवता -धामी ल ओबेखत आदमी के बलि तको दे देवय। बाद मा येला कुप्रथा मानके पशु (बकरा, चारगोडç¸या) अउ पंछी बलि देय लागिन। ये प्रथा ला बाद मा जीव हतिया मानके सासन हर रोक लगाए के उदीम करिस,तभो ले आजो भी कोनो-कोनो जगा मा ये प्रथा चलत चलागन मा हे। जनजाति समुदाय मा येहर आजो भी देखेल मिलथे। बड़का-बड़का देवी-देवाला मा तो खून के टीका देना ल नेंग मानथें। पहिली जग जवारा मा बलि प्रथा के नियमें रिहिस हे। आज महँगाई के दौर अउ नइ मिले के चलत ये प्रथा घटते क्रम मा हे। आज सादा नरबदा नरियर -फाटा, सेत मा जोत-जँवारा निकाले के संदेश परसारित करे जावत हे।
मदन मंडावी
डोंगरगढ़,राजनांदगांव,छत्तीसगढ़


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