@घुमन्तु गीत सीरीज@किडनैप

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कल होली है, और बच्चे न जाने क्यों उदास बैठे हैं! जैसे ही पतिदेव ने यह कहा, मैंने उन्हें कहा बच्चे अपनी दीदी की प्रतीक्षा में थे, हॉस्टल से दीदी आएँगी, तो भाई बहन खूब रंग खेलेंगे। अरे पर रेखा, तुमने उन्हें बताया नहीं कि सिया आ रही है? महारानी जी ने खुद ही जीत-पुनीत को बताने से मना किया है, कहती है सरप्राइज देगी! पतिदेव बोले अरे ये क्या बात हुई भला, साल भर का त्योहार और बच्चे होलिका दहन के दिन मुंह लटकाये बैठे हैं, जाने दो मैं ही उनको बता देता हूँ। और वे चल पड़े जीत-पुनीत के कमरे की ओर। जैसे ही उन्हें यह बताया दोनों खुराफातियों ने एक स्वर में कहा अच्छा दीदी की बच्ची! हम दोनों ने एक साथ अचम्भे में कहा, दीदी की बच्ची?? और इसी के साथ चारों ओर हंसी-ठहाके गूँज उठे। ख़ुशी ख़ुशी
होलिका दहन की तैयारी पूरी हुई, विधिवत पूजन संपन्न हुआ, और सब सो गए,सुबह उठकर हम किचन में जुट गए, पतिदेव सिया को लिवाने स्टेशन निकल गए, मैंने घड़ी में देखा साढ़े नौ बजने को हैं, चलो जीत-पुनीत को उठाया जाए, दस बजे तक सिया भी घर आ जाएगी। पर ये क्या, कमरे में तो कोई नहीं है, कहाँ गए ये दोनों, मैंने एक-एक कमरे में जाकर आवाज़ देना शुरू किया, जीत…. पुनीत….कहाँ हो बच्चों? पूरा घर सन्नाटे में था,और इन दोनों की कहीं कोई आहट न थी। मैंने सोचा, ज़रूर पीछे गलियारे में होंगे, होली खेलने की तैयारियों में पर वहां भी कोई न था, ना ही बाल्टी-रंग-पिचकारी…. कुछ नहीं!!! मैं अब घबराने लगी, डर गयी, इनसे कितनी बार कहा है, दरवाज़ा खुला छोड़ कर मत आया-जाया कीजिये, पर इन्हें कभी सुनना होता है क्या? कहीं कोई बच्चों को उठा तो नहीं ले गया, कहीं बच्चे किडनैप तो…??? दहशत में कांपती हुई मैं अपने मोबाइल की ओर दौड़ी, तभी सिया और उसके पापा आ गए,मैंने उन्हें सब बताया, अब हम सब घबराये-घबराये इधर-उधर ढूंढने भागने लगे। तभी मेरे मोबाइल के पास ही टेबल पर एक प्रिंटआउट रखा दिखा, अपने बच्चों को देखना चाहते हो तो छत पर आ जाना। हम दौड़ते हुए दो मंçज़लें पार करके छत पर गए, छत खुली हुई थी, दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, जैसे ही हमने दरवाज़ा खोला, पूरी छत लाल स्विमिंग पूल बनी हुई थी, चारों ओर लाल, पूरी छत लाल! हाय राम! जीत…. अजीत…. हिम्मत करके हम अंदर गए, टखनों तक उसी लाल तरल में चलते हुए हम इधर उधर पुकार लगा रहे थे, जैसे ही हम टंकी के पास पहुंचे, सिया पर ज़ोरदार पिचकारी अटैक हुआ- अब बता दीदी की बच्ची, कैसा लगा हमारा सरप्राइज, इन्होंने कहा, ये सब इतने ख़ुçफ़या तरीके से कब और कैसे…..??? अरे पापा, हम दोनों, पांच बजे दबे पाँव ऊपर चले आये, छत के सारे आउटलेट में कपड़े ठूंसे और पाइप लगा कर चुपके से पूरी छत भर ली, उसमे ढेर सारा लाल रंग घोला, और ये होली स्पेशल स्विमिंग पूल बन गया, दिदिया को सरप्राइज जो देना था!! शरीर कहीं के, मुझे गुस्से के साथ साथ हंसी भी आ रही थी, अपनी दिदिया के सरप्राइज में मुझे तो शॉक दे दिया न? अरे मम्मा, बुरा न मानो होली है!! अब हम पांचों उसी लाल रंग के तरल में लोटपोट कर होली खेल रहे थे!
प्रियंका अग्निहोत्री गीत
काशी,उत्तर प्रदेश


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