बैकुण्ठपुर/पटना@ क्या चुनाव प्रचार के लिए कर्मचारियों को निर्वाचन ड्यूटी से रखा गया है दूर?

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-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर/पटना,22 फरवरी 2025 (घटती-घटना)। एक शासकीय कर्मचारी द्वारा सरेआम चुनाव प्रचार करना, जिसका फोटो वीडियो भी लगातार सोशल मीडिया में वायरल हो रहा हो और जिसकी कई सारी शिकायत विभाग से लेकर जिला निर्वाचन आयोग तक की गई हो, उस पर विभाग द्वारा, जिला निर्वाचन आयोग द्वारा किसी प्रकार की कार्यवाही न करना संदेह को जन्म देता है। ताजा मामला ग्राम पंचायत छिंदिया का है, जहां जनपद पंचायत सदस्य के चुनाव लड़ रहे भूतपूर्व जनपद उपाध्यक्ष श्रीमती आशा साहू के पति जो की एक शासकीय शिक्षक हैं,के द्वारा खुलेआम अपनी पत्नी के पक्ष में सभा की जा रही है, और चुनाव प्रचार किया जा रहा है। इसके कई वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल है,पर जिला निर्वाचन आयोग द्वारा संज्ञान ना लेना समझ से परे हैं। जनपद सदस्य लड़ रहे प्रत्याशी के पति की कई शिकायतें कलेक्टर कोरिया से लेकर रिटर्निंग ऑफिसर जिला कोरिया, जिला शिक्षा अधिकारी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी के समक्ष की गई है, जिसमें आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के साथ ही अनेक गंभीर प्रकार के आरोप लगाकर भी शिकायत दर्ज है। परंतु विभाग और निर्वाचन आयोग द्वारा इन शिकायतों पर भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है। विभाग पर इस कर्मचारी को बचाने का आरोप भी लग रहा है। पहले शिक्षक महेश साहू की ड्यूटी त्रिस्तरी पंचायत चुनाव 2025 में भी लगाई गई थी, परंतु विशेष सहुलियत देते हुए इन्हें ड्यूटी से परे रखा गया,जबकि इनके ड्यूटी का आदेश भी आ चुका था। शिकायत के आधार पर इन्हें निर्वाचन संबंधी कार्य देखने के लिए जनपद पंचायत बैकुंठपुर में अटैच किया गया, परंतु वहां भी इन्होंने एक भी दिन उपस्थिति दर्ज नहीं कराई और लगातार दिन और रात अपनी पत्नी के चुनाव प्रचार में व्यस्त रहे। यह सोचनीय विषय है कि एक शासकीय कर्मचारी के ऊपर जिला निर्वाचन आयोग के साथ-साथ कलेक्टर और शिक्षा विभाग के अधिकारी आखिरकार इतने मेहरबान क्यों हैं।
बीमार या जरूरतमंद को नहीं मिला निर्वाचन के दौरान कोई अभयदान,नेतागिरी वाले कर्मचारी खुलेआम करते रहे नेतागिरी
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आदेश एवं निर्वाचन कार्य को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। इसके लिए संलग्न कर्मचारी को निर्वाचन कार्य से राहत मिलने में एड़ी चोटी का जोर लगाने पर भी राहत नहीं मिल पाती और उन्हें हर हाल में इस ड्यूटी को करना ही पड़ता है। कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि अक्षम होते हुए भी निर्वाचन कार्य को संपन्न कराना पड़ता है। निर्वाचन ड्यूटी लगने के बाद विशेष परिस्थितियों में कर्मचारी अपनी ड्यूटी हटाने के लिए गुहार भी लगाते हैं, परंतु राहत नहीं मिल पाती, वहीं दूसरी ओर एक स्वस्थ शासकीय शिक्षक जिसकी निर्वाचन ड्यूटी लगाई जाती है,परंतु पत्नी के चुनाव प्रचार में व्यस्त होने के कारण जिला निर्वाचन आयोग एवं स्वयं के विभाग द्वारा खुली छूट और अभय दान दिया जा रहा है। बीमार विकलांग और कई ऐसे कर्मचारी जो आकस्मिक रूप से निर्वाचन कार्य संपन्न कराने में असमर्थ हो जाते हैं, उन्हें अपनी ड्यूटी कटवाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। लेकिन नेतागिरी करने वाले शिक्षक को इतनी खुली छूट किसके शह पर दी जा रही है, यह सोचनीय विषय है।


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