पृथ्वी के जैव जगत के सभी जीव में अपनों के प्रति प्रेम का भाव निश्चित तौर पर एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।पर जैव जगत के सबसे विवेकवान प्राणी मानव आज कोई भी काज करता है,तो उस काज के प्रतिफल पर कुछ अपेक्षा और आशा रखता है।आज मानव संतान को जन्म देता है और अच्छे ढंग से परवरिश करता है बदले में वह अपेक्षा करता है कि मेरे संतान बुढ़ापे में सहारा बनेगा। एक पक्षी या अन्य जन्तु का विश्लेषण करें तो ज्ञात होता है कि जैसे ही पक्षी के बच्चे में मजबूत पंख आता है तो वह पक्षी आसमान पर उड़ जाता है अर्थात एक पक्षी अपने बच्चे से प्रेम करता है पर वह कभी आशा या स्वार्थ की अपेक्षा नहीं करता इनका प्रेम सदा स्वार्थ से परे होता है।
प्रेम की पराकाष्ठा कभी भी कोई चीज लेने का नही होता बल्कि सदा सर्वस्व देने का होता है।प्रेम में यदि अपेक्षा का भाव आता है तो प्रेम के अभिप्राय को बदल देता है।प्रेम में अपेक्षा नहीं बल्कि उपेक्षा होता है, उपेक्षा से तत्काल पीड़ा का अनुभव जरूर होता है पर इसका दूरगामी परिणाम सदा सुखमय होता है। हमारा शास्त्र गवाह है,कि माता कैकेई के निःस्वार्थ प्रेम के कारण श्रीराम जी चौदह वर्ष का वनवास गये और श्रीराम जी, श्रीराम जी से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी बने। माता सीता चौदह वर्ष के वनवास काटने के बाद अवध आती है। एक धोबी के लोकापवाद के कारण माता सीता जी एक आदर्श राजा के निर्णय में कोई स्वपक्ष लेने की बात ना आए, यह सोच कर माता सीता श्रीराम जी को छोड़कर स्वयं वन को चली गई। अतः माता सीता जी का प्रेम श्रीराम जी के प्रति समर्पण और त्याग का पराकाष्ठा थी।भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्नता पूर्वक माता कुंती से कहता है, कि हे बुआ आप मुझसे वरदान मांगों मैं आपको वर देना चाहता हूं, तो माता कुंती कहती हैं कि हे केशव मुझे देना ही है तो सुनो मेरा जीवन दुख से भर दो, केशव कहता पर ऐसा क्यों बुआ, कुंती कहती हे केशव दुख में तुम सदा मेरे चित्त में रहोगे और सुख में विस्मृत।यहॉं भी माता कुंती का केशव के प्रति प्रेम निःस्वार्थ भाव को दर्शाता है। प्रेम भले ही ढाई अक्षर शब्द का बना है और प्रेम शब्द का व्याख्या और विश्लेषण अनंत है।पर आज हम देखते हैं कि प्रेम का अर्थ वासना और स्वार्थ से लगाया जाता है,जो कि अनुचित है। पाश्चात्य संस्कृति पर आज चौदह फरवरी को एक छोटा सा दिवस वैलेंटाइन डे मनाया जाता है जिसमें आज बहुत से युवक युवतियां अपने संस्कार और मर्यादा को ताक में रख अशोभनीय व्यवहार करते हैं जो की निंदनीय है। प्रेम मानव जीवन का और मानवीय व्यवहार का एक महत्वपूर्ण अभिन्न अंग है, पर प्रेम वासना और स्वार्थ के वशीभूत ना हो तभी प्रेम शब्द का अर्थ सार्थक होगा, क्योंकि त्याग और समर्पण का अर्थ ही प्रेम है।
लक्ष्मीनारायण सेन
खुटेरी गरियाबंद (छ.ग.)
