आज मन के भीतर चल से स्वयं के अंतर्द्वंद्व कि आवाज़ को बहुत ही कान लगा कर सुन रही थी। पहले कुछ समझ नहीं आया कि क्यों मेरा मन, भाव, जज़्बात के बीच अंतर्द्वंद्व छिड़ा हुआ है? तब यकायक मुझे दिमाग के चिल्लाने की आवाज़ आई, आवाज़ कुछ कर्कश, क्रोध से भरी हुई थी। आखिर ऐसा क्या हो गया कि मेरा दिमाग़ मन के भावों के विचार सुन इतना आक्रोश में आ गया? तब पुनः खुद के भीतर हो रहे द्वंद पर कान लगाए।
अरे-अरे! वो कहावत सुनी होगी ना कि दीवारों के भी कान होते हैं ठीक उसी मुहावरे पर जैसे में खरी उतर रही थी और कान लगा सुन रही थी सब तब पता चला कि जिस बात पर इतना द्वंद चल रहा है वो बात कोई विशेष नहीं है दुनिया के लिये परंतु वो बात अगर विशेष है तो स्वयं के लिये, स्वयं के आत्म सम्मान के लिये। जानते हैं किस विषय पर मन, भाव, दिमाग, जज़्बात मेरे द्वंद कर रहे थे? उनके बीच द्वंद्व का विषय था कि काव्य लेखन आत्म सम्मान…
काव्य लेखन आत्म सम्मान… अर्थात जो आप लिख रहे हैं वो आपके प्रति क्या है मतलब कि आप सिर्फ खुद कि वाहवाही चाहते हैं लेखन से या आप अपने लेखन से खुद को सुकून दे खुद के आत्म सम्मान चाहते हैं। सच विषय पर यदि गंभीरता से ध्यान दें तो उस अर्थ विस्तार से यही निकलता है कि जो भी लेखक काव्य लेखन करता है उसे अपने काव्य लेखन को पढ़ सुकून मिले और उसे अपने ऊपर गर्व हो खुद को खुशी महसूस हो और उसे ये अनुभव हो कि मैं भी लिख सकती हूॅं या लिख सकता हूॅं घमंड नहीं परंतु गर्व और खुद के आत्म सम्मान कि अनुभूति हो तो आपका लिखना सफल हो जाता है। सर्वप्रथम स्वयं कि खुशी, उसके बाद पाठकों कि खुशी।
आलौचक तो अनगिनत मिल जाते हैं लेखक को और बहुत से लोग आलौचको के दिये अज्ञान रूनी ज्ञान को इतनी गहराई से हृदय में उतार लेते हैं कि वो ये मान बैठते हैं कि उन्हें अब नहीं लिखना चाहिए या मैं नहीं लिख सकता या नहीं लिख सकती जैसी हीन भावना मन में घर कर जाती है। अरे यदि कोई आलौचक कुछ आलौचना करता है तो अपनी कलम कि प्रखर आवाज़ से जोश भरे शब्दों में काव्य रूप में ही ऐसा जवाब दें कि आलौचक स्वयं अपने अज्ञान रूपी ज्ञान के हथियार को विवश हो आपके चरणों में समर्पित कर दें। आप जब तक स्वयं के लेखन का आंकलन दूसरों के कहने पर कम करेंगे तो दूसरे आपकी इसी कमजोरी का फ़ायदा उठाते हुए उसी आपकी कमजोर कड़ी पर वार दर वार करते ही रहेंगे और साहित्य जगत से आपके पांव को जमने से पहले ही उखाड़ फेंकेगे। अब आप सोचिये की आपका लेखन आपके प्रति क्या है? क्या आपका लेखन शैली, आपकी कलम आपके स्वयं के सुकून के लिये है या दुनिया कि झूठी हमदर्दी, वाहवाही के लिये है। मेरा लेखन मेरी कलम मेरी ताकत मेरा स्वयं का आत्म सम्मान है ये सोच से आगे जो साहित्य जगत में आगे बढ़े हैं वो एक मुकाम को जरूर पा सके हैं और वो पा भी रहे हैं। आज भी याद है वो दिन वो दिनांक वो वर्ष मुझे जब मेरे ही परिवार के सम्मानित वरिष्ठ सदस्य ने जब मुझे कहा था कि लोग बस यहॉं से वहॉं चोरी करके काव्य भेज अपने आप को कवि समझने लगते हैं और साथ ही कथा था अगर तुम लिखती हो तो चलो उठाओ कागज़ कलम और अभी लिख के बताओ कुछ बहुत दुःख हुआ था तब परंतु अपनी कलम को इन अज्ञानी कटु शब्दों से घायल नहीं होने दिया और मैं लिखती चली गई आज मेरी लेखनी किसी के लिये मायने रखते या न रखे, वाहवाही मिले या न मिले मैं सिर्फ खुद के लिये लिखती हूं। खुद के सुकून के लिये और आज भी मेरी लेखनी संग मेरा आत्म सम्मान मेरी नजरों में बरकरार है।
वीना आडवानी तन्वी
नागपुर,महाराष्ट्र

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