
वातावरण का हमारी सेहत पर प्रभाव होना संभाविक है। मनुष्य जिस तरह के वातावरण में सांस लेता है वह उसकी सेहत को मानसिक,शारीरिक और आत्मिक रूप से पूर्णतया प्रभावित करता है। पिछले कई सालों से दिल्ली का वातावरण चिंता का विषय बना हुआ है। आज वर्तमान समय में दिल्ली एक गैस चैंबर के रूप में परिवर्तित हो चुकी है। जिसका प्रभाव दिल्ली के नागरिकों की सेहत पर दिखाई दे रहा है। ऐसा माना जाता है कि पराली की समस्या के वजह से दिल्ली में प्रदूषण बढ़ जाता है। त्योहार शादियों पर चलाए गए बम पटाखे भी इसमें इजाफा करते हैं ? सवाल यह उठता है कि आखिर इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार या संबंधित कार्यालय द्वारा किस तरह के कदम उठाए गए हैं ? क्या प्रदूषण का एकमात्र कारण पराली का जलना है ? क्या ग्लोबल वार्मिंग जिसे लेकर समस्त विश्व चिंतित है यह उसका प्रभाव है? क्या आम जनता और सरकार इस प्रदूषण के लिए उत्तरदायित्व नहीं है? ऐसे बहुत से सवाल है जो आज दिल्ली के वातावरण को देखते हुए उठते हैं। आज दिल्ली की जनता के लिए सांस लेना मुश्किल हुआ हुआ है । जो व्यक्ति किसी भी तरह की थोड़ी सी शारीरिक, मानसिक समस्या से उत्पीडि़त है उसके लिए यह वातावरण घुटन पैदा कर रहा है । लो इम्यूनिटी होने की वजह से प्रदूषण का प्रभाव ऐसे व्यक्तियों को जल्द ही अपनी लपेट में ले लेता है ।जिसके चलते सांस की समस्या, आंखों में जलन ,स्किन एलर्जी , ब्रेन स्ट्रोक्स और हार्ट अटैक के अनगिनत मामले सामने आ रहे हैं। यदि हम इस समस्या को विश्व स्तर पर देखें तो पाएंगे कि न सिर्फ भारत के प्रदेश बल्कि विश्व भर में प्राकृतिक आपदाओं ने अपना तांडव मचा रखा है। यदि हम इसे आधार बनाए तो पाएंगे कि ग्लोबल वार्मिंग जिसका अलार्म बहुत पहले से बज चुका था उसके तथाकथित परिणाम अब विश्व भर में सामने आ रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि आधुनिक समय में बढ़ती हुई टेक्नोलॉजी, कंस्ट्रक्शन वर्क, गाडि़यों की भीड़ ने ग्लोबल वार्मिंग की समस्या में इजाफा किया है । आज के समय में दिल्ली जैसे शहर में गाडि़यों की ऐसी भीड़ है कि पैदल चलने वाले व्यक्ति को जगह नहीं मिलती । टेक्नोलॉजी के चलते आज ट्रैफिक की समस्या से बचने के लिए व्यू प्रवाहन पर विचार किया जा रहा है जल्द ही दिल्ली से गुड़गांव आप वायु परिवहन द्वारा कुछ ही मिनट में अपनी यात्रा पूर्ण कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि अभी वातावरण कि जिस समस्या से हम जूझ रहे हैं क्या वह समस्या इस तरह के कदम से वातावरण को और प्रभावित नहीं करेगी? क्या इस चीज पर पूर्णता विचार किया गया है या फिर इसे इंप्लीमेंट करने के बाद इसके परिणाम पर विचार किया जाएगा? क्योंकि अधिकतर हम यही पाते हैं कि सरकार/संबंधित कार्यालय द्वारा नई खोज, नई प्रोडक्ट जो मार्केट में आते हैं उनके परिणामों पर गहन अध्ययन के बिना ही उन्हें मार्केट में आने दिया जाता है ,जैसे की प्लास्टिक आज वातावरण के लिए एक सबसे विकराल मुद्दा बना हुआ है। जिसे अब पूरी तरह से प्रतिबंधित करना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। कंस्ट्रक्शन का वर्क इस तरह से अपने पांव पसार रहा है कि हर गली हर समिति हर जगह आपको कंस्ट्रक्शन होती दिखाई देती है। लोग न सिर्फ मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बना रहे हैं बल्कि अपने फ्लैट्स में भी गैर कानूनी कंस्ट्रक्शन तक कर रहे हैं । जिस पर कोई रोक नहीं है। घर में रहने वाले व्यक्ति इतने नहीं है मगर आज स्टेटस की दौड़ के चलते मकान की रिनोवेशन का काम आए दिन चलता रहता है। गंदगी अपने आप में एक बड़ी समस्या है। आज जनसंख्या एक विकराल रूप ले चुकी है और उसके साथ कूड़े की समस्या भी बढ़ चुकी है।समस्या यह है कि आज मानव साइंस और टेक्नोलॉजी के चलते यह समझता है कि वह कुदरत से लड़ सकता है जो सही नहीं है। कुदरत का अपना नियम है और उसे पर नियंत्रण पाना मानव के बस की बात नहीं । यदि हम आज भी नहीं जागे और गाडि़यों ,कंस्ट्रक्शन इत्यादि पर रोक नहीं लगाया गया तो इसके परिणामों को भुगतना ही पड़ेगा।
केशी गुप्ता
द्वारका दिल्ली