सूरजपुर@क्या जानवरों के डॉक्टर कि दिलचस्पी जानवर के इलाज में नहीं…जनपद सीईओ बनने में है?

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-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर 20 नवम्बर 2024 (घटती-घटना)। जब पशुओं का इलाज करना ही नहीं था तो फिर डॉक्टर क्यों बने? यह सवाल इसलिए हो रही है क्योंकि पशु विभाग के डॉक्टर पशुओं के डॉक्टर तो बन गए पर पशुओं के इलाज में उनकी रुचि नहीं है, उनकी रुचि तो इस समय मलाईदार पद याने की जनपद सीईओ बनने में देखी जा रही है, बेजुबान पशुओं में कई तरीके के बीमारी रहती है जिनके इलाज के लिए पशु चिकित्सालय हर जिले में खोले गए हैं, बेजुबान जानवरों का इलाज हो सके इसके लिए डॉक्टर भी पदस्थ किए गए हैं पर सूरजपुर जिले में स्थिति यह है कि अपना मूल काम छोड़कर पशु चिकित्साक जनपद सीईओ बनने में रुचि दिखाई है। सूरजपुर प्रशासन की एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है अब इस मनमानी कहें या फिर अनियमित कहें,यह तो प्रशासन के लोग ही बता पाएंगे,जो इस रास्ते पर चल रहे हैं,इस समय हम बात कर रहे हैं सूरजपुर जिला प्रशासन के अभी जो एक बात सामने आई है उसमें पशु चिकित्सा अधिकारी को जनपद पंचायत भैयाथान व ओड़गी का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनाया गया है,जबकि इनका मूल काम पशुओं का उपचार करना है, पशुओं का उपचार हो नहीं पा रहा और इन्हें दो-दो जगह का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनना कितना सही है? क्या सूरजपुर जिले में अतिरिक्त पशु चिकित्सा बैठे हैं जिनसे अन्य विभागों का संचालन करना जरूरी है? जहां डिप्टी कलेक्टर रैंक के कई अधिकारी जिले में मौजूद है इसके बावजूद पशु चिकित्साक को जनपद पंचायत का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनना व उसे वित्तीय पावर देना कितना सही है?
ऐसा बाकी जिलों में भी देखा जा रहा है या फिर सूरजपुर ऐसा इकलौता जिला है?
जिन्हें जिम्मेदारी सौंप गई है वह बहुत ही ऊंची पकड़ वाले व्यक्ति हैं जो अपने अनुसार पद भी ले आते हैं और उसे पर आसीन भी हो जाते हैं। यहां तक की एक जनपद पंचायत में दो मुख्य कार्यपालन अधिकारी रखा जा रहा है, एक के पास विाीय पावर होगी तो दूसरे के पास अन्य का प्रभाव होगा,क्या ऐसा बाकी जिलों में भी देखा जा रहा है या फिर सूरजपुर एक ऐसा इकलौता जिला है जहां पर ऐसा देखने को मिल रहा है? यहां तक की डिप्टी कलेक्टर रैंक के अधिकारी को छोड़ पंचायत इंस्पेक्टर तक को जनपद पंचायत का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनना क्या उचित है? या फिर नियम विरुद्ध माना जाए? वैसे जानकारों कहना है किस को भी जनपद सीईओ बनाया जा सकता है बस गस्टेड अधिकारी होना चाहिए।
पशु चिकित्सालय के कमरे में नेम प्लेट का बोर्ड लगा हुआ और दूसरी तरफ जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की सूची में भी नाम शोभा बढ़ा रही है
साहब का इतना दबदबा है कि जनपद पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी की सूची में भी नाम दिख रहा है साथ ही पशु चिकित्सालय के उनके कक्ष भी नेम प्लेट का बोर्ड लगा हुआ है, क्या एक साथ दोनों जगह पर कार्य कर रहे है? सवाल यह उठता है, कि जहां एक व्यक्ति एक जगह पर तो काम कर नहीं पा रहा है वैसे में लंबी दूरी के साथ दो-दो जगह पर कैसे काम कर पाएगा? तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं वही सवाल यह भी है कि जब उनका खुद का विभाग सभी कलेक्टरों को पत्र लिखकर यह कह है की उनके कर्मचारियों से काम ना करने का आदेश जारी किया है…इसके बावजूद दूसरे विभाग में काम करना क्या आदेशों की अवहेलना नहीं है? जबकि जिले में पशु चिकित्सकों की बहुत जरूरत है क्योंकि मवेशियों में कई प्रकार की बीमारियां आ रही हैं उसे पर डॉक्टर काम नहीं कर रहे और अपना विभाग छोड़कर दूसरे विभाग में धन अर्जन करना ही क्या उनका उद्देश्य है?
वर्तमान में पशु चिकित्सा विभाग के कई काम प्रभावित पर डॉक्टर साहब को बनना है सीईओ?
ज्ञात हो की प्रदेश में पशु संगणना शुरू हो चुकी है,इसको लेकर पशु चिकित्सा सेवाएं संचालनालय से हाल ही में एक पत्र जारी कर पशुपालन विभाग के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को इस काम में लगाए जाने का आदेश निकाला है। इसमें कहा गया है कि,संगणना में कार्य करने वाले अधिकारी और कर्मचारियों को कोई और काम नहीं दिया जा सकता। इस आदेश के बावजूद आरोप लग रहे है की, सूरजपुर जिले के पशुपालन विभाग उपसंचालक डॉ. नृपेंद्र सिंह को पिछले 7 महीने से विभाग के काम से दूर रखा गया है। चर्चा है कि, डॉ. नृपेंद्र ने अपनी राजनैनिक पहुंच का सहारा लेकर मनपसंद जगह पर नियुक्ति (अटैचमेंट) लिया है। वर्तमान में वे अपने मूल कार्य से इतर। ओड़गी लॉक के जनपद पंचायत सीईओ के रूप में कार्य कर रहे हैं। खासबात यह है कि उनके कर्तव्य स्थल से ओड़गी लॉक की दूरी करीब 80 किलोमीटर है। वर्तमान में पशु चिकित्सा विभाग के कई सारे काम प्रभावित हो रहे हैं। इसके बाद भी प्रशासनिक स्तर पर उनपर विशेष मेहरबानी की जा रही है। पशु चिकित्सा संचालनालय से जारी आदेश का मखौल बन रहा है। संचालक पशु चिकित्सा सेवा के मार्फत जारी हुए आदेश में कहा गया है कि पशु संगठना कार्यक्रम 31 दिसंबर तक संपन्न करना है। इसमें पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को ग्रामीण एवं शहरी वार्डों में घर-घर जाकर के मोबाइल ऐप के जरिए पशु संगठना करनी है। इसके लिए मैपिेंग कार्य जिला स्तर प्रशासन के अनुसार पूरा कर लिया गया है। ग्रामीण एवं शहरी प्रगणकों के साथ सुपरवाइजरों का प्रशिक्षण प्रशिक्षण सह कार्यशाला भी हो चुकी है। ऐप के माध्यम से संगठना के लिए आईडी पासवर्ड भी दिए जा चुके हैं। ऐसे में इस कार्य से जुडऩे वाले अफसर और कर्मचारियों को कोई और दायित्व नहीं दिया जा सकता। बता दें कि पशु संगणना कार्य पूरे देश में एक साथ कराया जा रहा है। बताया जा रहा है कि, संचालनालय ने पशु चिकित्सकों को अन्य कार्यो में संलग्न न करने के लिए जिला कॉलेक्टरों को पत्र लिखा है। ऐसे पशुचिकित्सक जो अन्य कार्यों में संलग्न किए गए हैं, उनको मूल पद पर वापस करने के लिए निर्देश दिए गए हैं। चर्चा गर्म है कि, डॉ. नृपेंद्र अपने मुख्यालय सूरजपुर में निवास न करके अंबिकापुर में रहते हैं।


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