बैकुण्ठपुर@शासकीय विभागों में इस दीपावली शुरू हुई नई परंपरा,कई जगह बंटी मिठाइयां और कई जगह कई तरह के उपहार

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  • एक पुलिस थाने के थानेदार ने बांटी पुलिस थाने के सभी कर्मचारियों को पुलिस की वर्दी
  • क्या शासकीय विभागों पुलिस थानों की यह नई परंपरा भ्रष्टाचार मुक्त परंपरा थी? पुलिस आखिर थाने के प्रभारी ने क्यों बांटी अपनी तरफ से…वेतन से सभी को वर्दी?
  • थाना क्षेत्र में टिककर रहने की है ख्वाइश,जिले का सबसे कमाऊ थाना है इसलिए बांटी गई वर्दीःसूत्र


-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर,01 नवम्बर 2024 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में इस बार की दिवाली कई शासकीय कार्यालयों के कर्मचारियों सहित कई पुलिस थानों के पुलिस कर्मियों के लिए काफी सुखद रही वहीं जिले में शासकीय कार्यालयों और पुलिस थानों में एक नई परंपरा शुरू भी होती नजर आई जो कर्मचारियों के बीच उपहार वितरण की परंपरा के रूप में देखी गई। वैसे पहले शासकीय विभागों में इस तरह की परंपरा नहीं थी और त्यौहार पर समय से वेतन प्रदान कर देना ही शासकीय कार्यालयों और विभागों की जिम्मेदारी थी, लेकिन इस दिवाली सबकुछ बदला नजर आया और एक नई परंपरा उपहारों वाली नजर आई। शासकीय कार्यालयों और पुलिस थानों की यह नई परम्परा क्या भ्रष्टाचार मुक्त परंपरा थी, क्या इस हेतु भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लिया गया? इस नई परंपरा के बाद यह भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है क्योंकि कोई शासकीय कार्यालय प्रमुख यदि यह कहे की उसने अपने वेतन से अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को त्यौहार पर तोहफा दिया तो ऐसी सूचनाओं और ऐसे प्रयासों को लेकर सबसे पहला सवाल यही खड़ा होना है कि क्या उनका यह प्रयास यह उनकी सहृदयता कहीं भ्रष्टचार से तो प्रेरित नहीं है। शासकीय कार्यालयों सहित कुछ पुलिस थानों के प्रभारियों ने भी अपने पुलिस थाने के कर्मचारियों को उपहार प्रदान कर मिडिया में प्रसारित कराया और खूब वाहवाही लेने का काम किया लेकिन उन्होंने अपने वेतन से क्यों उपहार प्रदान किया यह सवाल अपनी जगह खड़ा है।
मिली जानकारी के मुताविक पुलिस थाना पटना के प्रभारी जिले के उन थाना प्रभारियों में शुमार हुए या कहें इकलौते साबित हुए जिन्होंने अपने थाने के कर्मचारियों को उपहार देने का काम किया। वैसे थाना प्रभारी ने यह भी खूब प्रसारित कराया की वह अपने वेतन से उपहार प्रदान कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि जब एक थाना प्रभारी उपहार बांट सकता है या वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है तो विभाग के उच्च अधिकारियों या अन्य पुलिस थाने के प्रभारियों ने ऐसा कोई उदाहरण क्यों पेश नहीं किया? सूत्रों का कहना है की वैसे पटना पुलिस थाना जिले का काफी प्रमुख पुलिस थाना है और इसलिए भी थाना प्रभारी ने एक उदाहरण पेश किया क्योंकि इस थाने के लिए एक दो लोग प्रतीक्षा में जिले में मौजूद हैं और उन्हें अपनी बारी का इंतजार है जो पहले इस थाने के मजे का आनंद उठा चुके हैं। प्रतीक्षा में कहीं और से आकर जिले में ठहरा कोई और न इस पद पर आ धमके इसलिए भी इस तरह के उपहार की व्यवस्था थानेदार ने की यह माना जा रहा है। वैसे क्या यह उपहार वितरण भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था अंतर्गत एक प्रयास था या यह भ्रष्टाचार सहित वाला मसला था यह समझने की जरूरत है?
उपहार त्यौहार में बांटने की परंपरा गलत नहीं पर भ्रष्टाचार से इसके लिए धन न जुटाया जाए…
उपहार त्यौहार में बांटने की परंपरा भी गलत नहीं है लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा की सभी शासकीय कार्यालयों में यह वितरण किया जाए और कोई भी छोटा बड़ा कार्यालय या कोई शासकीय संस्था इससे बचने न पाए साथ ही इस संदर्भ में वितरण के लिए लगने वाली लागत भी शासन से ही प्रदाय की जाए भ्रष्टाचार से इसके लिए धन न जुटाया जाए। वैसे अपने वेतन से वस्त्र बांटना किसी थाना प्रभारी द्वारा ऐसा प्रसारित कराना कहीं न कहीं यह भी जतलाना है कि वह अति संपन्न है और बख्शीश त्यौहार पर बांटने की हैसियत उसकी है उसके पास। वैसे अब जिले के आला अधिकारी अवश्य इस तरफ ध्यान दें कि उनके विभाग में कोई अलग से कोई उदाहरण न प्रस्तुत करे बल्कि यदि कोई उदाहरण प्रस्तुत ही करना है तो वह सभी प्रस्तुत करें वहीं जब स्वेक्षा से उपहार वितरण किया किसी ने वेतन से किया तो इसके लिए प्रचार प्रसार और मीडिया प्रसारण की आवश्यकता क्यों आन पड़ी और क्यों ऐसी ख्याति प्राप्त करने किसी थानेदार ने प्रयास किया जो खोखली ख्याति और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना कहावत को चरितार्थ करने वाली बात होगी
अन्य शासकीय विभागों में भी देखा…देखी उपहार वितरण देखा गया…
कई अन्य शासकीय विभागों में भी देखा देखी यह देखा गया कि उपहार वितरण अधिकारियों ने किया लेकिन शासकीय विभागों में यह परम्परा कहां से आई कौन इसके जन्म का कारण बना यह स्पष्ट नहीं है, वैसे उत्पादन इकाइयों में त्योहारों पर बोनस उपहार वितरण की परंपरा रही है और वहां यह जायज भी नजर आता था लेकिन शासकीय कार्यालयों में क्यों उपहार का वितरण अधिकारी कर रहे हैं और इसके लिए वह किस तरह लागत की व्यवस्था कर रहे हैं यह समझ से परे है और यह जांच का विषय भी है। वहीं कई कार्यालयों में यदि उपहार की व्यवस्था की गई जिले के ही कई अधिकारियों ने यदि ऐसा उदाहरण पेश किया तो अन्य ने या अन्य विभागों ने क्यों नहीं उपहार वितरण किया? और क्यों उन्होंने नहीं कर्मचारियों को त्यौहार पर सम्मानित किया? यह उच्च अधिकारियों के लिए जिले के सोचने का विषय है, क्योंकि ऐसे में अन्य कार्यालयों में कार्य करने वाले कर्मचारियों के मनोबल में और उनकी कार्यक्षमता में गिरावट देखने को मिलेगी और उनके भीतर एक अलग भावना जो अन्य से खुद को अलग मानने की भावना होगी वह जन्म लेगी और इससे सभी विभागों के बीच आपसी सामंजस्य बिगड़ता नजर आयेगा।
थानेदार क्यों अपने वेतन से अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को वस्त्र वितरण किया?
वैसे पटना क्षेत्र में बावन परियों का खेल जोर-शोर से जारी है और यह खेल कई जगहों पर अलग अलग लोगों द्वारा खिलाया जा रहा है ऐसी सूचना आम हो चली है और यदि यह जानकारी सही है तो क्या इसी कारण और वहीं से मिले सहयोग से यह वितरण सम्पन्न किया गया यह भी एक प्रश्न है। वैसे कोई थानेदार क्यों अपने वेतन से अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को वस्त्र वितरण करेगा और क्या इसके लिए शासन का विभाग का निर्देश है यह भी सवाल इस वितरण के बाद खड़ा हुआ है।


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