कोरिया,@क्या गेज बांध मुआवजा प्रकरण में फिर शुरू हुई दलाली?

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-रवि सिंह-
कोरिया,18 जून 2024 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में वर्ष 1992 में जिस बांध के लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया था उसकी मुआवजा राशि में बड़ा खेल हो रहा है, प्रकरण 20 वर्ष पुराना होने के कारण अब इसमें अधिकारी मलाई मारने में लगे हैं दलाल मुख्य भुमिका में है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय इसमें कांग्रेस से जुड़े दलाल सक्रिय थे अब सरकार बदलने के बाद भाजपाई दलाल सक्रिय हो गए हैं। कहा जा रहा है कि दलाल किस्म के एक व्यक्ति का स्थानीय एक अधिकारी के साथ निजी होटल में मुआवजा प्रकरण को लेकर बैठक भी हो चुकी है,और उसी व्यक्ति के अनुसार अधिकारी पूरा खेल खेलने में मस्त हैं। चूँकि दलाल किस्म के व्यक्ति को शुरू से हराम का खाने की आदत है और इसी से वह मंहगी गाडि़यों का शौक रखता है,क्षेत्र के जनप्रतिनिधी भी बुरी तरह से उसके गिरफ्त में हैं। बांध के मुआवजा प्रकरण में जिस प्रकार से लीपापोती का खेल चल रहा है उससे शासन को ही नुकसान हो रहा है पर दुर्भाग्य का विषय है कि अब इसमें सत्ता पक्ष के दलाल ही सक्रिय है। बतलाया जाता है कि जब कांग्रेस की सरकार थी तो जिनके द्वारा विरोध किया जाता था आज उनके द्वारा ही समर्थन किया जा रहा है। पूरा खेल जिले के जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के एक दलाल के माध्यम से खेला जा रहा है अब विपक्ष भी शांत बैठा हुआ है।
ज्ञात हो की अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले के बैकुण्ठपुर क्षेत्र के छरछा बैकुण्ठपुर में गेज बांध निर्माण जमीन अधिग्रहण 1992 का मामला जिसके मुआवजे में 30 साल के विलंब के बाद मुआवजे वितरण सूची में गड़बड़ी का आरोप लगा था। समय के साथ मुआवजा के असली हकदार भटक रहे कब्जा धारी मुआवजा राशि लेने की फेर में प्रशासन पर मिलीभगत कर मुआवजे का गलत वितरण कराने का गंभीर आरोप है और इस आरोप का जांच की मांग उठ¸ने भी लगी और वर्तमान कलेक्टर ने मौखिक रूप मुआवजा वितरण पर रोक तो लगा दी था पर आचानक सरकार बदलते एक बार फिर मुआवजा देने की काव्यात शुरू हो गई है इसमें से कुछ लोगों को मुआवजा मिल गया है और बंदरबांट हो चुका है। अब सवाल यह है कि सारे दस्तावेज सूची बनाने वाले जिम्मेदार अधिकारी की तरफ गड़बड़ी ईषारा कर रहे है आखिर गड़बड़ी मामले में जांच कब होगी? जिस पर गड़बड़ी का आरोप है उस जिम्मेदार अधिकारी को पद से पृथक कर जांच क्यों नहीं किया गया? क्या शासन के पैसो का बंदरबांट करने के लिये समय दिया गया है? मामले में साक्ष्य भी मौजुद है और शिकायत भी हुयी है इसके बाद गड़बड़ करने वालो के हौसले बुलंद है साथ ही कई गड़बड़ी होती जा रही है, मुआवजे सूची का प्रकाशन के बाद कुछ हितग्राहीयों को मुआवजा वितरण किया गया है पर गड़बड़ी की शिकायत होने पर बैंक से पैसा निकासी पर रोक नहीं लगायी गयी।


2018 में शुरू हुये प्रकरण में आ रही घोटाले की गंध
1992 के प्रकरण को ही आगे लेकर बढ़ना था क्योंकि यह सारे प्रकरण मौजुदा विभाग के पास दस्तावेज के तौर पर पड़े थे और सारी जानकारीयां पूर्णतः स्पष्ट थी पूर्व के अधिकारीयों ने भू-स्वामीयों को संतुष्ट करने के बाद ही अधिकग्रहण किया था, यही वजह था कि उस समय सिर्फ मौखिक आपत्ती ही आयी और उस मौखित आपत्ती को गंभीरता से लेते हुये जांच में के लिये वापस भेज दिया था, उन्हें क्या पता था कि बांध भी बन जायेगा और मुआवजे का प्रकरण अटका रह जायेगा। किसानों की सहमति व ईच्छा से कोरिया जिले को एक मध्यम परियोजना के तौर पर गेज बांध मिला जो आज कितने किसानों के लिये सिंचाई का साधन तैयार हो गया। आज उसी किसानों के धैर्य व त्याग का फायदा उठा 2018 में भू-माफिआ व जनप्रतिनिधि सक्रिय होकर नया प्रकरण शुरू करा दिया, जिस प्रकरण में सिर्फ खामिंया ही दिख रही है। खामियां भी छोटी नहीं काफी बड़ी है बांध तो कई एकड़ की भूमियों में तैयार हो गया पर उसमें से डूबान क्षेत्र के 95 एकड़ की भूमि थी वह भूमि किसानों की निजी थी जिसे बांध के लिये किसानों ने सरकार को दे दिया और इसके एवज में सरकार ने उन्हें मुआवजा का आबंटन किया पर यह राशि हितग्राहियों को समय पर नहीं मिली और जब दुबारा प्रकरण तैयार कर मौजुदा प्रशासन,शासन को ही करोड़ो का चुना लगा रहा है। पूर्व में जमीन मुआवजा के लिये 95 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जिसमें 39 एकड़ में 11 हितग्राहियों को 4 लाख 36 हजार 191 का मुआवजा वितरण हो गया था। जिसमें शेष 56 एकड़ भूमि के 38 हितग्राहियों को 6 लाख 27 हजार का शेष रकम बच गया था जो वर्तमान में बढ़कर यह अधिग्रहित भूमि 140 एकड़ हो गयी और 38 हितग्राहीयों की संख्या बढ़कर 61 हो गयी। वहीं 6 लाख 27 हजार की रकम बढ़कर 17.34 करोड़ हो गयी। रकम के अंतर राशि 278 गुणा हो गया, जिस राशि में देखा जाये तो 17.27 करोड़ का ईजाफा हो गया। यह ईजाफा का वजह सिर्फ राजस्व के बड़ी लापरवाही है। इस बड़ी लापरवाही में यदि किसी को नुकसान हो रहा है तो सिर्फ शासन को, लापरवाही में जल संसाधन विभाग की भी मौन स्वीकृति से इंकार नहीं किया जा सकता।
शिकायतकर्ता ने लगाया था आरोप
शिकायतकर्ता के आरोप अनुसार गेज बांध मुआवजे गड़बड़ी में पहला मामला यह है कि ग्राम छरछा व रकैया के क्षेत्र में गेज बांध का निर्माण होना था जिसके लिये 08.08.1991 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुयी उस समय अविभाजित मध्यप्रदेश तत्कालिन कलेक्टर सरगुजा के प्रभावित हितग्राहियों की अधिसूचना एवं भूमि का विवरण का व्यापक प्रचार-प्रसार करते हुये, इसकी सूचना जारी की। भू-अर्जन अधिनियम 1994 (क्रं. 01 सन् 1894) की धारा 4 की उक्त धारा 01 तथा धारा 06 के उपबंधो के अनुसार अधिसूचना तथा उद्घोषणा का प्रकाषन मध्यप्रदेश राज्यप्रत्र के भाग 01 में क्रमषः पृष्ठ संख्या 1865 दिनांक 18.101991 तथा तथा पृष्ठ संख्या 728 दिनांक 06.03.1992 को प्रकाशित कराया गया था। उपरोक्त अधिसूचना तथा उद्धघोषणा का प्रकाशन दो स्थानीय समाचार पत्रों में विस्तृत जानकारी के साथ प्रकाषन कराया सूची जारी कराया था। ईश्तहार जारी कर 15 दिवस के भीतर भूमि के संबंध में आपत्ती यदि कोई हो तो आमंत्रित किया गया इसके अलावा धारा 9 (3) के अंतर्गत स्थल पर जाकर सम्बन्धित हितग्राहियों से स्वतः अर्जित क्षेत्रफेल, किस्म,भूमि के निहित अंष अथवा क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में लिखित आपत्ती की मांग की गयी थी किन्तू किसी हितग्राही का कोई आपत्ती प्राप्त नहीं हुआ। किन्तू स्थल जांच के दौरान कुछ ग्रामीणों जो आदिवासी समुदाय के थे उन्होंने डूबान में आने वाली भूमि जिस पर वह मकान, बाड़ी बनाकर 20 से 25 वर्ष से काबिज थे उन व्यक्तियों ने चोरी से नजायज पट्टा हासिल कर लिया है ऐसे व्यक्तियों को मुआवजा न देकर उनकों दिये जाने का निवेदन किया गया है जिसकी षिकायत गंभीरता से लेते हुये अधिकारी द्वारा बैकुण्ठपुर तहसीलदार को जांच करने का निर्देष दिया उसके पष्चात 37.993 हे0 में से 15.663 हे0 निजी भूमि का आर्डर पारित किया गया। अविभाजित मध्यप्रदेश के तत्कालीन सरगुजा कलेक्टर द्वारा 1992 में जारी जमीन अधिग्रहण सूचना के आधार पर सूची जारी की गयी थी उस दौरान बांध निर्माण वाले क्षेत्र का कुल रकबा 37.993 हे0 था, जिसमें हितग्रहियों की संख्या 49 हितग्राहि थे जिसमें से 15.663 हे0 और 11 हितग्राहियों को मुआवजा वितरण कर दिया गया। यदि इसी सूची को आगे लेकर चला जाता तो शायद हितग्राहियों को समय पर मुआवजा भी मिलता और साथ ही किसी भी हितग्राहियों का पैसा किसी दूसरे को नहीं मिलता और शासन का पैसा भी बचता। पर इस सूची को मध्यप्रदेश विभाजन के बाद आगे लेकर नहीं चला गया, जानकारों का मानना है कि 1992 के सारे दस्तावेजों को दरकिनार कर नये सिरे से भूमि अधिग्रहण का प्रकरण शुरू किया और मुआवजे में राशी से लेकर जमीन का अधिग्रहण रकबा व मुआवजा राशि इतनी बढ़ गयी कि ऐसा लगा कि बांध बनते ही जमीन फैल गया और हितग्राही बढ़ गये। जिसकी गड़बड़ी अचानक 2022 में मुआवजा वितरण के दौरान सामने आयी जिसे लेकर शिकायत व जांच की मांग उठ¸ने लगी। जिसे 1992 में मिला मुआवजा उसी जमीन का मुआवजा अधिक रकबे व राशि के साथ कब्जे धारक को देने के लिये सूची में नाम आ गया।
पहले थे कांग्रेसी दलाल अब भाजपाई दलाल सक्रिय
गेज बांध मुआवजा प्रकरण मामला एक गंभीर विषय बन चुका है,इसमें खेल चल रहा है खेल अधिकारियों के द्वारा ही खेला जा रहा है पूरा सेटिंग दलाल के द्वारा किया जा रहा है। जिन भू स्वामियो को लाखों में राशि मिलनी थी 30 साल से एक फूटी कौड़ी नही मिली। अब यदि 80 के जगह 40 ही मिल रहा है तो उसमें भू स्वामी भी खुश है कुछ तो मिला। बहुत बड़ा सवाल है कि पहले या कहें कि भूपेश सरकार के कार्यकाल में इस प्रकरण में कांग्रेसी दलाल लगे हुए थे अब सरकार बदलने के बाद भाजपाई दलाल सक्रिय हो गए है। जो भाजपाई गेज बांध मुआवजा प्रकरण पर साल भर पहले आरोप लगा रहे थे वहीं अब इस प्रकरण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं जैसा कि सूत्रों का कहना है।
मुआवजा के लिए 12 करोड़ आया,2.5 करोड़ निकला: सूत्र
गेज बांध का प्रकरण 30 साल पुराना है लेकिन इस प्रकरण की राशि अभी प्राप्त हुई है,सूत्रों का कहना है कि शासन द्वारा लगभग 12 करोड़ भेजा गया है जिसमें से जिम्मेदार अधिकारी द्वारा तत्काल ही 2.5 करोड़ की राशि आहरण कर ली गई है अब उसे चेक के माध्यम से प्रभावितों को देने की बात सामने आ रही है। हलांकि प्रकरण में कई कमियां हैं,कई लोगो के नाम बदले जाने की जानकारी प्राप्त हो रही है। नजायज पट्टा लेकर भी लोग मुआवजा राशि प्राप्त करने की जद्वोजहद में हैं।
किस अधिकारी के साथ हुई थी दलाल की बैठक?
मुआवजा प्रकरण में अब जो दलाल किस्म का व्यक्ति सक्रिय है वह भाजपा के जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से गहरा संबंध रखता है ऐसा सूत्रों का कहना है। विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि जो दलाल सक्रिय है वह अधिकारी से संपर्क में है और अधिकारी को एक जनप्रतिनिधी ने ही बैठक एवं अन्य कार्यो के लिए कहा था। दलाल को शुरू से हराम की खाने की आदत है और वह दलली करके ही ऐशो आराम की जिंदगी जी रहा है। सूत्रों का कहना है इसी जून माह में दलाल और एक अधिकारी की बैठक शहर के एक होटल में हुई थी दलाल वहां पहले से मौजूद था जबकि अधिकारी कुछ देर बाद। दलाल ने स्थानीय भू माफियाओं से संपर्क कर सारे मुआवजा प्रकरण का ठेका ले रखा है। दलाल सिर्फ बिचैलिये का काम कर रहा है जो भू माफिया है वह भु स्वामियों से संपर्क कर उन्हे मुआवजा राशि दिलाने की बात कह रहा है और प्राप्त राशि में से आधी राशि देने की बात कह कर सेट कर रहा है। अब चुकि भू स्वामी पिछले 30 साल से परेशान हैं उन्हे एक फूटी कौड़ी भी नही मिली है अब जो मिल जाए वही सही है। इसलिए भू स्वामी भी जल्दी से भू माफिया के झांसे में आ जा रहे हैं। क्षेत्र में बड़े बड़े जनप्रतिनिधी हैं जो कि जनता के लिए काम करने का ढोंग करते हैं इस मामले में उनकी चुप्पी है जो कि गंभीर मामला है।
क्या मुआवजा वितरण के लिए ही नही हटाई गईं एसडीएम?
गेज बांध मुआवजा वितरण का सारा काम बैकुंठपुर एसडीएम अंकिता सोम के नेतृत्व में किया जा रहा है,उनके द्वारा ही 2.5 करोड़ आहरण कर लेने की बात सूत्रों के द्वारा की जा रही है। एसडीएम अंकिता सोम को जब बैकुंठपुर का एसडीएम बनाया गया तो उसमें कांग्रेस सरकार के नेताओं की अहम भूमिका थी उस दौरान विपक्ष में रहे भाजपाईयों की एक नही सूनी जाती थी लेकिन सत्ता बदलते ही एसडीएम के सुर भी बदल गए हैं। जो भाजपाई एसडीएम के विरूद्व आवाज उठाते थे वहीं अब एसडीएक की तारिफ कर रहे हैं। जिले मे अनेक डिप्टी कलेक्टर हैं जिन्हे एसडीएम बनाया जा सकता है लेकिन कोरिया कलेक्टर की क्या मजबूरी है कि अंकिता सोम को बैकुंठपुर से नही हटाया जा रहा है यह समझ से परे है।
प्रमोशन के बाद एसडीएम बने रहना कितना सही?
बतलाया जाता है कि जब अंकिता सोम को बैकुंठपुर का एसडीएम बनाया गया था तो इसमें तात्कालिक विधायक अंबिका सिंहदेव की मुख्य भुमिका थी उस दौरान तात्कालिक विधायक के चंगु मंगु के इशारे पर एसडीएम कार्यालय से सारा काम हो रहा था। चंगु मंगु भू माफियाओं के भी आका बन कर पूरा संरक्षण दे रहे थे। अब वहीं सरकार बदलते ही भू माफियाओं ने भी आंका बदल लिया है अब आंका भाजपाई हो गए हैं जिससे कि काम चलता रहे। लोकसभा चुनाव के पूर्व अंकिता सोम को संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर के पद पर शासन ने पदोन्नत कर दिया है चुकि अचार संहिता के ठीक पहले पदोन्नति हुई थी इस वजह से अन्य जिले में पदस्थापना नही हो सकी थी लेकिन सवाल उठ रहा है कि आखिर अपर कलेक्टर बनाये जाने के बाद भी कलेक्टर द्वारा उन्हे एसडीएम बनाकर क्यों रखा गया है। कोरिया जिले में कई योग्य डिप्टी कलेक्टर हैं लेकिन वे कलेक्टोरेट में टाईम पास कर रहे हैं। वहीं लगता है अंकिता सोम ही जिले में एकमात्र होनहार अधिकारी हैं कि उन्हे मुख्यालय एसडीएम के साथ साथ जिला खनिज न्यास का भी प्रभारी अधिकारी बनाकर रखा गया है, कलेक्टर कोरिया की मजबूरी इस विषय में समझ से परे है।
1992 का प्रकरण कैसे हुआ खत्म
अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले के बैकुण्ठपुर के छरछा ग्राम में किसानों की भूमि की सिंचाई के लिये गेज नदी पर गेज बांध का निर्माण करने का प्रस्ताव 1991 में तैयार हुआ, जिसके लिए किसानों की भूमि अधिग्रहण करने की प्रक्रिया शुरू हो गई, यह प्रक्रिया 1992 में पूरी कर ली गयी। उस समय इस बांध को बनाने के लिये किसानों की 95 एकड भूमि का अधिक्रहण किया गया। अधिग्रहण की भूमि में 49 हितग्राहीयों के नाम शामिल थे जिन्हें तकरीबन 10.66 लाख भुगतान होना था जो तत्कालिन समस्याओं की वजह से अधिकारीयों ने नहीं कर पाया और यह प्रकरण 26 साल ठंडे बस्ते में पड़ा रहा और जब शासन-प्रशासन जागी तो इस प्रकरण को आगे बढ़ोने की बजाये नया प्रकरण शुरू कर दिया, इस 26 सालों में क्या भाजपा क्या कांग्रेस सभी आये और गये पर किसानों के अधिग्रहण के पैसो की चिंता किसी ने नहीं की। किसान भी एक समय के लिये इस पैसों को भूल बैठे थे पर कुछ जनप्रतिनिधि अपने निजी लाभ और अधिकारीयों को प्रलोभन देकर मामले को 2018 में कुछ भू-माफिआयों के साथ मिलकर प्रकरण शुरू कराया पर सवाल यह है कि पुराने प्रकरण को दफ्न कर नये प्रकरण क्यों शुरू किया गया?
बिना भौतिक सत्यापन के 21 हितग्राहियों को मुआवजा राशि देने का मामला
21 हितग्राहियों में 4 करोड़ 75 लाख की राशि तो बंट गयी सवाल यह है कि जब यह पूरा मामले ही संदेह के घेरे में है तो इतनी हड़बड़ी क्यों प्रशासन ने दिखायी राशि के भुगतान करने में हांलाकि राषि हितग्राहियों में बंटा पर इसमें भी एक गड़बड़ी दिखी जो हल्का पटवारी बिना भौतिक सत्यापन की चेक का वितरण करते हुये राशि दे दी गयी।
कब्जे धारी को बिना दस्तावेज को कैसे मिल रहा मुआवजा
1992 में रकबा व खसरा नं के साथ भूमि अधिग्रहण की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रकाशित कर दी गयी थी, जिसकी जानकारी मौजुदा विभाग के पास मौजुद है फिर भी 2018 में नया कजेदार का नाम कैसे और किस आदेश के तहत आ गया और मुआवजे पाने का अधिकार कैसे उसे मिल गया। बिना दस्तावेज के प्रशासन क्यों पुराने मुआवजे सूची को विलोपित कर नयी सूची में नाम शामिल कर दिया। जबकि जमीन डूबान क्षेत्र की है तो फिर डुबान क्षेत्र की जमीन पर कब्जा कैसे?
सहमति पत्र में रकबा और खसरा नंम्बर निरंक क्यों?
सहमति पत्र में भी राजस्व विभाग का बड़ा खेल हुआ है दस्तावेजों का अवलोकन करने से हितग्राहियों व कब्जा धारीयों के सहमति पत्र में नाम व हस्ताक्षर तो मौजुद है पर रकबा व खसरा का विवरण निरंक क्यों है। जब हितग्राही सहमति पत्र में हस्ताक्षर कर रहा है तो उसे यह जानने का अधिकार नहीं कि उसे किस रकबे व खसरा नं0 भूमि के लिये सहमति दे रहा है। यह भी एक जांच का विषय है पर शायद ही विभाग इसकी जांच कर पाये।
प्रकशित ईष्तहार में नाम क्यों नहीं था?
1992 में जब भूमि अधिग्रहण संबधित प्रकरण का प्रकाशन समाचार पत्रों में कराया था, उसमें सारे जानकारीयां हितग्राहियों के लिये स्पष्ट तौर पर मौजुद था, जबकि देखा जाये तो उस समय सूचना व सम्पर्क की इतनी व्यवस्था नहीं रही। इसके बाद भी तत्कालीन जिम्मेदारों ने बड़ी ईमानदारी से यह कार्य कराया था। पर वहीं 2018 में इसी प्रकरण को दोबारा नया प्रकरण बनाकर इसे प्रारंभ किया गया तो इस प्रकरण में कई अनिमियता देखा जा रहा है, अखबारों में इसकी सूचना प्रसारित की जाती है तो हितग्राहियों का नाम व उसके पिता का नाम या फिर कजेदारों का नाम निरंक करके प्रसारित करायी जाती है जो कहीं न कहीं घोटाले को व्यापक तौर पर करना दर्शाता है और जानकारी छुपाने का संदेह भी प्रकट होता है।
मुआवजे मिले हुये जमीन का दुबार मुआवजा क्यों?
1992 में प्रश्नकिंत भूमि का मुआवाजा जिस हितग्राहियों को मिल गया, उसी जमीन का मुआवजा फिर से 2022 में किसके कहने प्रस्तावित किया गया। उदाहरण स्वरूप दस्तावेज का आंकलन करने से पता चला कि 1992 में भूस्वामी हृदयलाल पिता मनरूप खसरा नं. 570/36 का रकबा 1.214 हे0 भूमि का मुआवजा राशि 33 हजार 807 रूपये मिल गया था पर इसी भूमि में वर्तमान में हृदयलाल कब्जा धारी बन गये और भूस्वामी सगीरनिशा पिता मो0 ईषाक भू स्वामी बन गये और मुआवजा सूची में नाम आ गया और जो रकबा था वह वर्तमान में बढ़कर 2.426 हे0 हो गया जिसकी मुआवजा राशि 75 लाख 43 हजार बनायी गयी है। जबकि उक्त भूमि का 1992 में यह मुआवजा मिल गया था अब जो पैसा मिल रहा है वह हितग्राही के लिये उपहार स्वरूप है पर यह उपहार शासन क्यों दे रही है यह शासन पर बड़ा सवाल है।
अधिग्रहण के बाद कब्जा क्यों जबकि डुबान क्षेत्र का कब्जा नहीं किया जा सकता?
जानकारों का मानना है कि एक बार यदि अधिग्रहण हो गयी और इसकी सूचना प्रसारित हो गयी तो इस भूमि बंटवारा, कजा यहां तक कि खरीदी-बिक्री नहीं हो सकता क्योंकि इस तहरह की भूमि पर स्थगन आदेष जारी रहता है। इसके बावजुद यदि इसमें कोई राजस्व के जिम्मेदार छेड़छाड़ करते है तो उन्हें अपराधी न मानकर पदोन्न कर दिया जाते है।
मामले से जुड़े कुछ सवाल
सवाल: क्या कोरिया गेज बांध मुआवजा मामले में हुआ बड़ा घोटाला?
सवाल: गेज बांध मुआवजा घोटाला मामले में शिकायत हुई पर जाँच निष्पक्ष नहीं…प्रशासन चुप क्यों?
सवाल: गेज बांध मुआवजा घोटाले में राजस्व या जल संसाधन विभाग इनमे से किसका हो सकता है हाथ?
सवाल: 1992 में 95 एकड़ भूमि का 49 हितग्राहियों में मिलना था 10.63 लाख मुआवजा राशी, फिर 2022 में भूमि 140 एकड़ व मुआवजा राशी 17.34 करोड़ कैस होगी?
सवाल: शासन को 17 करोड़ 34 लाख देना पड़े तो समझिये शासन के पैसो का दुरूपयोग कितना गुना होगा?
सवाल: अधिकारियों की लापरवाही से शासन को करोड़ो का नुकसान इसकी भरपाई कौन करेगा?
सवाल: क्या जिम्मेदारों पर होगी बड़ी कार्यवाही क्योंकि शासन के पैसे को ही बंदरबांट करने के फिराक में?
सवाल: 1992 में अधिग्रहण हुये जमीन मुआवजा राशि का भुगतान 2022 में हुआ शुरु?
सवाल: गेज बांध मुआवजे की गडबड़ी मामले में आखिर प्रशासन कब करेगा निष्पक्ष जांच?
सवाल: अविभाजित मध्यप्रदेश का 1992 का मुआवजा सूची सही या वर्तमान 2022 का मुआवजा सूची सही?
सवाल: 1992 की मुआवजा सूची को प्रशासन क्यों नहीं दे रहा तवज्जो, नये सूची पर भरोसा क्यों?
सवाल: अनुविभागीय अधिकारी पर गड़बड़ी का लग रहा आरोप, आखिर कौन करेगा इसकी जांच?


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