मामला अयोध्या की आसपास की 5 सीटों का पूरा गणित
नई दिल्ली,15 मई 2024(ए)। लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में उत्तर प्रदेश की 14 सीटों पर 20 मई को मतदान कराया जाएगा। इसमें फैजाबाद (अयोध्या) सीट भी शामिल है। अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव है। फैजाबाद के आसपास की कई सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इनमें कैसरगंज,अमेठी और लखनऊ की सीट शामिल है। इस चरण में उत्तर प्रदेश में इन सीटों के अलावा मोहनलाल गंज, जालौन, झांसी, हमीरपुर, बांदा,फतेहपुर,कौशांबी,बाराबंकी, रायबरेली और गोण्डा सीट पर मतदान कराया जाएगा।
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद पहला चुनाव
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद फैजाबाद में यह पहला लोकसभा चुनाव हैं। इस सीट पर 2019 में भाजपा के लल्लू सिंह ने जीत दर्ज की थी।भाजपा ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया है। वहीं इंडिया गठबंधन से समाजवादी पार्टी इस सीट पर चुनाव लड़ रही है। इस सामान्य सीट पर सपा ने अनुसूचित जाति के अवधेश प्रसाद को मैदान में उतारा है.। वहीं बसपा के टिकट पर सच्चिदानंद पांडेय चुनाव मैदान में हैं। इंडिया गठबंधन में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतार दिया है। उसकी टिकट पर अरविंद सेन यादव चुनाव लड़ रहे हैं। वे फैजाबाद से तीन बार सांसद रहे मित्रसेन अगर 2024 की लड़ाई की बात करें तो भाजपा के लिए राह आसान नहीं दिखती है,क्योंकि 2014 की तुलना में उसकी जीत का अंतर 2019 में काफी घट गया था। यानी की सपा से उसे काफी चुनौती मिली.वहीं इस बार चुनाव में सीपीआई के आने से सपा के लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं। सीपीआई उम्मीदवार अरविंद सेन यादव 2019 के चुनाव में उम्मीदवार रहे आनंद सेन यादव के भाई हैं। राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को वोट दिलाने में कामयाब होता है या नहीं, इसका पता तो चार जून के बाद ही चल पाएगा।
क्या कैसरगंज में कायम रहेगा बृजभूषण शरण सिंह का दबदबा?
वहीं कैसरगंज सीट की चर्चा इस बार काफी हुई। कैसरगंज के सांसद और बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलावानों से बदसलूकी के आरोप लगे। इन आरोपों के बाद भाजपा ने इस बार उनका टिकट काटकर उनके बेटे करन भूषण सिंह को दे दिया। इस सीट से बृजभूषण सिंह लगातार तीन बार सांसद रह चुके हैं।.साल 2009 के चुनाव में वो कैसरगंज से सपा के टिकट पर जीते थे।उन्होंने बसपा के सुरेंद्र नाथ अवस्थी को 72 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया था। सपा को 34.7 और बसपा को 21.9 फीसदी वोट मिले थे। साल 2014 के चुनाव में वो एक बार फिर भाजपा में शामिल हो गए। इस बार उनकी जीत के अंतर में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया।
उन्होंने सपा के विनोद कुमार सिंह ऊर्फ पंडित सिंह को 78 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया। लेकिन वो अपना वोट शेयर बढ़ाने में कामयाब रहे। भाजपा को 40.4 फीसदी और सपा को 32.1 फीसदी वोट मिले.भाजपा ने 2019 के चुनाव में उन पर फिर भरोसा जताया। यह चुनाव सपा और बसपा ने मिलकर लड़ा था। कैसरगंज बसपा के खाते में गई थी। बृजभूषण शरण सिंह ने बसपा के चंद्रदेव राम यादव को दो लाख 61 हजार के अधिक वोटों के अंतर से हराया। इस बार बृजभूषण अपना वोट शेयर करीब 19 फीसदी बढ़ाने में सफल रहे।
क्या लखनऊ में जीत की हैट्रिक लगा पाएंगे राजनाथ?
अगर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की बात करें तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जीत की हैट्रिक लगाने के लिए चुनाव मैदान में हैं। लखनऊ सीट भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाती है। भाजपा इस सीट पर पहली बार 1991 में जीती थी। उसके बाद से लखनऊ में उसे कोई हरा नहीं पाया है।अगर पिछले तीन चुनावों की बात करें तो 2009 में यहां से लालजी टंडन जीते थे। उन्होंने कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी को 40 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया था। भाजपा को 34.9 और कांग्रेस को 27.9 फीसदी वोट मिले थे।इस बार भाजपा ने एक बार फिर राजनाथ सिंह पर ही भरोसा जताया है। सपा ने उनके सामने लखनऊ मध्य विधानसभा सीट से विधायक रविदास मल्होत्रा को उम्मीदवार बनाया है।वहीं बसपा ने मोहम्मद सरवर मलिक को उम्मीदवार बनाया है।
क्या सीट बदलने से जीत जाएंगे राहुल गांधी?
इस साल कांग्रेस ने अमेठी में अपना उम्मीदवार बदल दिया है। कांग्रेस ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। वहीं भाजपा ने स्मृति ईरानी पर फिर भरोसा जताया है।वहीं बसपा की ओर से नन्हें सिंह चौहान चुनाव मैदान में हैं.पूरे देश की नजरें इस सीट पर लगी हुई हैं।रायबरेली सीट यह भी कांग्रेस की परंपरागत सीट है।बीते चुनाव में इस सीट से कांग्रेस की सोनिया गांधी जीती थीं। लेकिन अब वो राज्य सभा चली गई हैं.। कांग्रेस ने इस बार राहुल गांधी को उम्मीदवार बनाया है। उनका मुकाबला भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह से है।