- माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी नामजद एफआईआर दर्ज नहीं हुआ और 8 साल बाद बिना पुलिसकर्मियों नाम के ही चालान पेश हो गया:सूत्र
- क्या उच्च अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों को बचाने के लिए 8 साल का लंबा इंतजार किया और बिना कर्मचारियों के नाम के ही चालान पेश किया?
- पीडि़त को परेशान करने वाले भी पुलिसकर्मी और परेशान करने वाले पुलिसकर्मियों की जांच का जिम्मा संभालने वाली भी पुलिस…क्या इसी वजह से पीडि़त को मिलने वाले न्याय के बीच जांच अधिकारी बने बाधा और पुलिसकर्मियों को बचाया?
- न्याय की लड़ाई लड़ने वाली भी दुनिया छोड़ गई न्याय की उम्मीद में लेकिन दुनिया छोड़ने के बाद क्या न्याय उसको क्या मिलना नहीं था जायज?
- न्यायालय आदेश के बाद तकालीन थाना प्रभारी व प्रधान आरक्षक के विरुद्ध मामल हुआ था पंजीबद्ध पर नाम को छिपाकर हुआ था मामला दर्ज
- मामला पंजीबद्ध होने के बाद बिना जमानत व विभागीय जांच के पुलिसकर्मी आज भी कैसे डटे है नौकरी में?
- जहां एफआईआर दर्ज होते ही नौकरी से पृथक होना था पर प्रभाव में आज भी काट रहे नौकरी का मजा
- आमजनों पर मामला पंजीबद्ध करना पुलिस के लिए आसान पर पुलिस पर मामला पंजीबद्ध करें कौन?
- 8 साल बाद भी आरोपी पुलिसकर्मियों का चालान पेश न होना कहीं ना कहीं कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है?

-रविं सिंह-
बैकुण्ठपुर,12 मार्च 2024(घटती-घटना)। 8 साल पहले कोरिया जिले के कुछ पुलिसकर्मियों के ऊपर जबरन बिना किसी आदेश के अतिक्रमण हटाने को लेकर शिकायत हुई थी पर शिकायत पर कार्यवाही नहीं की गई थी, जिसके बाद प्रार्थी ने उच्च न्यायालय से गुहार लगाई थी जिसके बाद उच्च न्यायालय ने पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अपराध पंजीकृत करने का आदेश जारी किया था, जिसके बाद पुलिस ने उच्च न्यायालय के आदेश के दबाव में एफआईआर तो दर्ज किया पर पुलिसकर्मियों का नाम नहीं लिखा,जबकि आदेश में नामजद एफआईआर दर्ज करना था पर ऐसा हुआ नही। अब जब सरकार बदल गई है तब यह उम्मीद लगाई जा रही है कि ऐसे पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही होगी और उनके ऊपर विभागीय जांच सहित इन्हें पद से पृथक किया जाएगा? यह सवाल बना हुआ था पर जैसे ही सत्ता बदली इस मामले की जांच अधिकारी ने अपने विभाग के पुलिसकर्मियों के बचाव करते हुए बिना पुलिसकर्मियों के बिना नाम के ही चालान को अन्य आरोपियों के नाम से दिसंबर माह में न्यायालय में पेश कर दिया और अपना पल्ला झाड़ लिया,तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने भी इस मामले में पुलिसकर्मियों को बचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई और जाते-जाते इन पुलिसकर्मियों को राहत की सांस लेने का मौका दे दिया पर वही पीडि़त के न्याय लिए किसी ने नहीं सोचा जिसकी झोपड़ी तोड़ने यह पुलिसकर्मी किसी के कहने पर बिना आदेश के पहुंच गए थे और उस गरीब को खूब सताया था वह वृद्ध गरीब महिला न्याय की लड़ई लड़ रही थी और इस बीच उसका निधन भी हो गया पर ऐसा लगा कि उसके निधन के बाद ही शायद उसको न्याय मिल जाए पर ऐसा होता नहीं दिखा, पुलिस वालों ने अपने पुलिसकर्मियों की गलतियों पर पर्दा डालते हुए उनके नाम को एफआईआर से लेकर चालान पेश करने तक दूर रखा और 8 साल के इंतजार के बाद चालान पेश कर अपना एक झमेला दूर कर लिया पर वही पीडि़त की न्याय की लड़ाई में रसूखदार पुलिसकर्मियों को उनके जांच अधिकारी ने बचा लिया। जांच अधिकारी ने भी कहीं ना कहीं उच्च न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया और अपने कर्मचारियों को बचाने के लिए पूरा प्रयास किया।
अब चालान पेश हो गया है और बताया जाता है की चालान को देखकर समझा जा सकता है की कैसे पुलिस ने पुलिस को बचाया क्योंकि जांच उनके ही पास थी अन्य कोई होता वह जेल जाता यह भी तय था बस पुलिस ने पुलिस को बचाया यह कहा जा सकता है और न्याय को केवल इसलिए हाशिए पर डाल दिया क्योंकि मामले में पुलिसकर्मी फंसते नजर आ रहे थे।
ज्ञात हो कि किसी भी अधिकारी के लिए उनके सारे कर्मचारी एक समान होते हैं पर किसी एक कर्मचारी को विशेष महत्व देना कहीं ना कहीं संदेह उत्पन्न करता है कुछ ऐसा ही मामला कोरिया जिले के पुलिस विभाग का है जहां पर एक प्रधान आरक्षक पर अधिकारियों का आशीर्वाद बरसता रहता है अब इसकी वजह चाहे जो भी हो, कोरिया के एक प्रधान आरक्षक हमेशा विवादों में घिरे रहते हैं इनके खिलाफ शिकायतों का अंबार है पर जो भी अधिकारी आता है वह इस प्रधान आरक्षक का मुरीद हो जाता है ना जाने ऐसा कौन सा गुण है इनमें की जो यह बोल दे वही अधिकारियों को अच्छा लगता है और सही भी चाहे तरीका गलत क्यों ना हो, जबकि इस प्रधान आरक्षक को कोई भी ईमानदार अधिकारी पसंद नहीं करता या फिर यह कहा जाए तो उसके विभाग के लोग भी इसे पसंद नहीं करते फिर भी अधिकारियों की चमचागिरी व पावलगी कर अधिकारियों के हितैसी बने रहना उसे खूब आता है।
प्रधान आरक्षक को संभाग से बाहर किया जाए इसकी मांग भी लगातार हो रही है…
कोरिया जिले के एक प्रधान आरक्षक को लेकर यह भी मांग होती रही है की उनका तबादला संभाग से बाहर की जाए तभी कई मामलों में उनकी संलिप्तता का खुलासा हो सकेगा। उनका तबादला होगा तभी कई मामले जो उनके विरुद्ध हैं उसकी जांच हो पाएगी। ऐसा कुछ पुलिसकर्मी ही चाहते हैं वहीं कुछ उससे पीडि़त लोग भी चाहते हैं।
क्या प्रधान आरक्षक के रहने से अवैध कारोबारी को मिलता है संरक्षण?
प्रधान आरक्षक अवैध कारोबारियों को भी संरक्षण देते हैं जिसको लेकर कुछ महीने पूर्व एक ऑडियो भी वायरल हुआ था साथ ही थाने के सामने एक आरोपी के परिजनो से पैस भी लिया गया था जो थाना के सीसीटीवी में कैद हुआ था पर जांचा नहीं हुई,जिसमे तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने उन्हे कुछ नहीं किया था। अवैध कारोबारी प्रधान आरक्षक से काफी संपर्क में रहते हैं और यही उन्हे विभाग में उनकी पहुंच का माध्यम बनाते हैं जैसा बताया जाता है। कुल मिलाकर प्रधान आरक्षक पुलिस विभाग की छवि खराब कर रहे हैं और कोरिया पुलिस पर से जनता का विश्वास कम करने का कारण बन रहे हैं। जिस भी मामले में इनका नाम आता है वह मामला खुद व खुद विवादित हो जाता है और मामले में निस्पक्षता समाप्त हो जाती है।
मामला पंजीकृत होने के बावजूद बिना जमानत व बिना विभागीय जांच के पुलिसकर्मी डटे है नौकरी में…यह है पूरा मामला
पुलिस पत्रकार पर या अन्य निर्दोषों पर बिना जांच के मामला पंजीबद्ध तो कर लेती है पर जब खुद इनके ऊपर मामला पंजीबद्ध होने की बारी आती है तो घबरा जाते हैं फिर बचाव के लिए पूरे पैतरे अजमाने लगते है एक तो इनकी शिकायत हो भी जाए तो इन्ही के अधिकारी इन्हें बचाने लगते है जब की वह भी जानते है की उनका कर्मचारी गलत व दोषी है पुलिस के खिलाफ कितनी भी शिकायत हो जाए यही वजह है कि जांच तो उसी विभाग के अधिकारी को करना है जिस वजह से उन्हें हर बार बच निकलने में सहूलियत होती है, इनके ऊपर तो कार्यवाही तब होती है जब कोई इनके पीछे पड़ जाए उच्च स्तर पर या फिर न्यायालय की शरण ले तब जाकर उसे जीत हासिल हो पाती है पर जीत के आने के बाद ही फिर उसी विभाग के कार्यालय के चक्कर लगाकर अपने चप्पल घिसने पढ़ते हैं फिर भी राहत नहीं मिलती कुछ ऐसा ही मामला है कुछ सालों पहले का है जहां पर एक व्यक्ति के प्रभाव में पुलिस वाले एक महिला का घर तोड़ने व कब्जा दिलाने के लिए चले जाते हैं उस महिला की शिकायत पर अपराध पंजीबद्ध नहीं होता तब महिला को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है तब वहां पर उच्च न्यायालय मामले में संज्ञान लेते हुए अपराध पंजीबद्ध करने तो कहता है जिसके बाद 10 दिन के बाद उस मामले में अपराध पंजीबद्ध होता है पर उस पंजीबद्ध एफआईआर में पुलिसकर्मियों का नाम नहीं होता, वर्ष 2016 में एक महिला की शिकायत पर पुलिसकर्मियों ने मामला पंजीबद्ध नहीं किया तब उसने उच्च न्यायालय शरण लिया लिया था जिसमें उच्च न्यायालय ने 29 नवम्बर 2016 को अपराध पंजीबद्ध करने का आदेश दिया था, जिसमें नामजद अपराध पंजीबद्ध होना था पर पुलिस वाले ही जब अपराध पंजीबद्ध करते हैं तो अपने ही पुलिस वालों का नाम कैसे लिख सकते हैं बिना नाम के ही उन्होंने 9 दिसंबर 2016 को अपराध पंजीबद्ध किया,जिसमें उन्होंने पुलिसकर्मियों के नाम की जगह अज्ञात लिख दिया पर सवाल यह है कि हाईकोर्ट के आदेश में सभी के नाम दिए गए थे पर इसके बावजूद पुलिस ने नामजद अपराध दर्ज नहीं किया ना आज तक उन पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी हुई और ना ही वह पुलिसकर्मी ने जमानत लिया और ना ही विभागीय जांच ही सही से हो पाई, अब समझा जा सकता है कि पुलिसकर्मी यदि करें तो सब सही बाकी के ऊपर पुलिस टूट पड़ती है जबकि संविधान में साफ है कि पुलिसकर्मी भी यदि दोषी हैं तो उन पर भी अपराध पंजीबद्ध होना चाहिए पर अक्सर खाकी खाकी की मदद ही करता है और बचने का पूरा प्रयास करता है।
क्या उच्च अधिकारियों की मनसा में ही नहीं था यह विचार की पुलिसकर्मियों के खिलाफ करनी है कार्यवाही?
पूरे मामले में बड़ा सवाल यह है की जब न्यायालय ने पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही करने और उनके नाम से प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश जारी किया था तब क्यों पुलिसकर्मियों का नाम जिन्हे दोषी माना गया था प्राथमिकी में शामिल नहीं किया गया।क्या पूरे मामले में पुलिस के उच्च अधिकारियों की मनसा ही नहीं थी की वह पुलिसकर्मियों के विरुद्ध जिनके खिलाफ शिकायत थी वह कार्यवाही करें या उन्हे दंडित करें क्योंकि वह दोषी हैं। वैसे पुलिस विभाग में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है जब जांच दूसरे की होती है वह जांच में काफी ईमानदार हो जाते हैं वहीं जब मामला पुलिस के ही कर्मियों के दोष से जुड़ा होता है वह उन्हे बचाने में लग जाते हैं। वैसे बैकुंठपुर के मामले में साफ है की पुलिस के उच्च अधिकारी दोषी पुलिसकर्मी को बचाने में अपनी पूरी निष्पक्षता ही हाशिए पर डाल दिए जिससे वह बच सके।
उच्च अधिकारियों ने सिर्फ जांच में पुलिसकर्मियों को बचाने का काम किया?
बैकुंठपुर के जिस मामले की बात आज यहां की जा रही है उसमे पीडि़त की मौत भी न्याय के इंतजार में हो चुकी है वहीं जिन पुलिसकर्मियों पर बिना आदेश जमीन पर जाकर कब्जा दिलाने का आरोप लगा था जिसे यह माना जा सकता है की वह गुंडागर्दी का मामला था क्योंकि कब्जा दिलाने के लिए पुलिसकर्मियों को कोई निर्देश जारी नहीं था और वह दोषी एक तरह से साबित थे फिर भी उन्हे बचाने जांच के काफी लीपापोती उच्च अधिकारियों के निर्देश पर किया गया। कुल मिलाकर दोषियों को इसलिए बचाया गया क्योंकि वह पुलिसकर्मी थे और वह भी ऐसे जिन्हे उच्च अधिकारियों का हमेशा संरक्षण मिलता रहा है और वह इसी तरह की मनमानी करते रहे हैं।
पुलिसकर्मीयों ने बिना कागज सत्यापन के क्यों गए थे वृद्ध महिला का कब्जा खाली करवाने?
मामला जिसमे वृद्ध महिला से भूमि कब्जा खाली कराने पहुंचे थे पुलिसकर्मी बैकुंठपुर के उसमे सबसे बड़ा सवाल यह है की बिना कागज सत्यापन के कैसे पहुंचे थे पुलिसकर्मी। क्या वह यह तय करने का इरादा ही नहीं रखते थे की जो कागज उन्हे दिखाया जा रहा है वह सही है या नहीं है या फिर उन्हे कोई बड़ा लालच मिला हुआ था जिस वजह से वह बिना कागज सत्यापन ही पहुंचे थे कब्जा खाली कराने। वैसे बात जो भी हो दोषी थे पुलिसकर्मी तभी न्यायालय ने उनके विरुद्ध नामजद प्राथमिकी दर्ज कराने निर्देश दिया था पुलिस अधिकारियो को जो उन्होंने नही किया और पूरा लीपापोती करते हुए अपने विभाग के कर्मचारियों को बचाने का प्रयास किया।
आखिर प्रधान आरक्षक पर कब तक बरसती रहेगी कृपा?
जिले के सबसे चर्चित प्रधान आरक्षक जिनकी कई बार शिकायतें भी हो चुकी हैं। सत्ता किसी की भी हो अधिकारी कोई भी हो उक्त प्रधान आरक्षक को जहां भी अपनी पदस्थापना लेनी होती है वह लेकर रहता है। विभागीय अधिकारी भी उक्त प्रधान आरक्षक के सामने नतमस्तक हैं और उसके पीछे किसका हांथ है जो अधिकारी भी उसके सामने झुके हुए हैं बड़ा सवाल है। अब सवाल यह भी है की एक प्रधान आरक्षक पर कब तक कृपा बरसती रहेगी। बता दें की कोरिया जिले के जिस प्रधान आरक्षक की बात की जा रही है वह जुगाड लगाने में माहिर है और जिसकी भी सरकार हो वह अपना जुगाड लगा ही लेता है। अब देखना है की भाजपा की नई पारी में भी वह जुगाड लगा पाता है या भाजपा इस बार उक्त प्रधान आरक्षक को तवज्जो नहीं देती है।
बैकुंठपुर थाने में अपराध दर्ज फिर भी पदोन्नति व थान पाने का देखते है सपना
जिले के जिस प्रधान आरक्षक की शिकायतों का अंबार है उसके विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं हो पाती? उसके ऊपर बैकुंठपुर कोतवाली में ही अपराध भी दर्ज है। अपराध की जांच लगातार चल रही है क्योंकि पुलिस की जांच पुलिस कर रही है। मामले में प्रधान आरक्षक को बचाने में विभागीय अधिकारी भी उसकी मदद कर रहें हैं। बताया यह भी जा रहा है की खुद के ऊपर अपराध दर्ज होने के बावजूद उक्त प्रधान आरक्षक को अपनी पदोन्नति का इंतजार है जबकि अपराध दर्ज होने की स्थिति में पदोन्नति बाधित की जानी चाहिए। जहां अपराध दर्ज होने के बाद उन्हें पद से पृथक कर देना था वहां आज भी वह पद पर बने हुए हैं स्थिति यह है कि इनके एक ही जिले में रहने से पुलिस की कार्यप्रणाली भी कई मामलों में संदेह के घेरे में रहती है फिर भी उसके ऊपर मेहरबानी क्यों बरसती है यह बड़ा सवाल है अब जब सरकार बदली है सत्ता बदला है तो अब उम्मीद जगी है कि कार्यवाही भी होगी और जिले से इनका बाहर स्थानांतरण भी होगा।
उच्च अधिकारियों तक शिकायत फिर भी आज तक कार्यवाही का इंतजार
प्रधान आरक्षक की कई बार शिकायत भी हो चुकी है। शिकायत के बावजूद कार्यवाही आज तक लंबित है। जिले में आने वाले हर अधिकारी को प्रधान आरक्षक अपनी गिरफ्त में ले लेता है और कार्यवाही से बच निकलता है। अब देखना यह है की जिले में कब कोई पुलिस अधिकारी उक्त प्रधान आरक्षक के संबंध में हुई शिकायत की जांच करता है और निष्पक्ष कार्यवाही करता है। वैसे अभी तक ऐसा कोई पुलिस अधिकारी सामने नहीं आया है और देखना है की अब कोई अधिकारी हिम्मत दिखाता है की नहीं।
प्रधान आरक्षक को अपने ही विभाग के कर्मचारी नहीं करते पसंद
कोरिया जिले के जिस प्रधान आरक्षक की बात की जा रही है उसे जिले के ही पुलिसकर्मी पसन्द नहीं करते। इसके पीछे का कारण यह माना जाता है की वह अपने ही विभाग के कर्मचारियों की शिकायत करता है वह भी झूठी और फिर उसी आधार पर वह अधिकारियों का खास बन जाता है। जिले में कई अच्छे प्रधान आरक्षक और पुलिस कर्मी उसकी वजह से कई बार अधिकारियों की प्रताड़ना का शिकार हो चुके हैं। वैसे प्रधान आरक्षक केवल यही काम भी करते हैं उनका काम अन्य पुलिसकर्मियों पर निगरानी रखना और अधिकारियों तक उनकी चुगली पहुंचाना ही है जिसकी वजह से उन्हे अन्य पुलिसकर्मी पसन्द नहीं करते।