पत्नी की मौत का दाग लिए
न्याय के लिए भटका
नई दिल्ली,28 फरवरी 2024 (ए)। निर्दोष साबित होने में पूरी उम्र बीत गई। अपनी ही पत्नी की मौत का दाग लिए एक शख्स 30 साल से न्याय के लिए भटक रहा था। आज सुप्रीम कोर्ट ने महज 10 मिनट के भीतर उसे दोषमुक्त कर दिया। इस दौरान शीर्ष अदालत ने सिस्टम पर भी सवाल उठाए। इस बात पर अफसोस जताया कि यदि आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी को बरी करने में 30 साल लग गए तो भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली स्वयं ही आरोपी के लिए सजा बन सकती है, आज इसका उदाहरण देखने को मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 को एक महिला के आत्महत्या प्रकरण में उसके पति पर लगे उकसाने के आरोप को रद्द कर दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमा शुरू होने के लगभग 10 मिनट के भीतर ही 30 साल पुराने केस में फैसला सुना लिया। फैसला सुनाते समय अदालत ने इस बात पर अफसोस जताया कि यदि आपराधिक न्याय प्रणाली को आरोपी को बरी करने में 30 साल लग गए तो यह समझा जा सकता है कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली खुद ही आरोपी के लिए सजा बन सकती है।