पटना वन विभाग से डिपो में नहीं रहता लकड़ी,जनप्रतिनिधि का भी इस मामले को लेकर उदासीन रवैया
काष्ठागार में जलाऊ लकड़ी उपलब्ध कराये वन विभाग:राजेन्द्र गुप्ता
-संवाददाता-
बैकुण्ठपुर/पटना 21 जनवरी 2024 (घटती-घटना)। कोरिया जिला व बैकुंठपुर विधानसभा का सबसे बड़े क्षेत्र में आता है पटना 84 इस समय यदि कोई बड़ी समस्या है तो वह अंतिम संस्कार के समय लकड़ी न मिल पाने की, इन क्षेत्रों में दाहसंस्कार के लिए इलेक्टि्रक मशीन नहीं है लकड़ी पर ही आश्रित है पर लकड़ी भी न मिलने से दाहसंस्कार के लिए लोगों को भटकना पड़ता है, यह एक ऐसा समय रहता है जब किसी के घर का कोई सदस्य जाता है तो उसकी परेशानी खुद भी ज्यादा होती है पर लकड़ी न मिलने पर उसकी परेशानी और बढ़ जाती है पर इस और जनप्रतिनिधियों का भी ध्यान नहीं जाता, पटना में काष्ठागर भी है पर वहां पर लकड़ी उपलब्ध नहीं रहता।
ज्ञात होगी एलपीजी गैस आने के साथ कई और ईंधन के संसाधन लोगों के पास मौजुद है पर आज भी ग्रामीण ईलाकों में ईंधन के तौर पर लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। परंतु शव को अंतिम संस्कार में जलाने की परम्परा पुरातन रही है। इसलिये दाहसंस्कार जैसे परम्परा में लकड़ी की विशिष्ट स्थान है, और यह आवश्यक सुविधा में आता है। पटना 84 में आये दिन लोगों को दाह संस्कार के लिये ईमारती लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिये उन्हें जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर के आश्रित रहना पड़ता है और वहां लाने में लोगो का अतिरिक्त पैसा भी लगता है। सालों पहले वन विभाग के द्वारा रेंजर ऑफिस के पीछे लकड़ी व्यवस्था रहती थी पर कुछ सालों से यहां लकड़ी क्यों नहीं मिल पाती यह समझ के परे है।
पंचयत सिर्फ निर्माण पर ही देती है ध्यान यदि वह चाहता तो लकड़ी उपलब्ध हो जाता…
क्षेत्र में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी उपलब्ध कराना भी स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दायित्व है पर इस दायित्व को निभाने में वह असमर्थ है, उनका सिर्फ पूरा ध्यान निर्माण में ना की क्षेत्र के लोगों को भी लकड़ी उपलब्ध हो सके किसी और भी उन्हें ध्यान देना चाहिए, पर अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी उपलब्ध हो इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों का भी इस और कोई ध्यान नहीं जाता जबकि यह समस्या आए दिन की है और इस समस्या से पूरा क्षेत्र पीडि़त है और यह बात पंचायत प्रतिनिधियों को पता है।
पंचायत के जनप्रतिनिधियों का दायित्व बनता है
पटना निवासी राजेन्द्र गुप्ता उर्फ बाबू ने लोगों को होने वाले तकलीफो को साझा करते हुये बताया कि यदि वन विभाग ध्यान नहीं देता है तो पंचायत के जनप्रतिनिधियों का दायित्व बनता है कि वह कम से कम अपने पंचायत के लोगों के लिये आम लोगों के इस विशिष्ट कार्य के लिये लकड़ी की व्यवस्था कराये। जबकि हमारा पंचायत अब नगर पंचायत की दौड़ में शामिल है पर मूलभूत सुविधा के लिये हमें जिला मुख्यालय में वन विभाग के डीपो अथवा निजी व्यवसायी के अधीन रहना पड़ता है। पटना में भी इसकी सुविधा वर्षो पहले मिला करती थी पर अब जनप्रतिनिधियो के साथ वन विभाग के अधिकारीयों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है।