-राजा मुखर्जी-
कोरबा,10 नवम्बर 2023 (घटती-घटना)। जिले में रेत की चोरी में लगाम नहीं लग पा रहा । प्रशासन द्वारा रेत चोरी के रोकथाम में की गई कई कोशिशों के बाद भी रेत माफिया हैं सक्रिय । एक तरफ जिले में दूसरे चरण का विधानसभा चुनाव संपन्न होने हैं जिसके लिए पूरा सरकारी तंत्र प्रक्रिया में व्यस्त है । इसी का फायदा उठाते हुए रेत तस्करों ने हसदेव नदी के अलावा अन्य स्रोतों से रेत की तस्करी धड़ल्ले से शुरू कर दी है। खासकर रात के वक्त इनकी सक्रियता ज्यादा देखने को मिल रही है । इनके हौसले इतने बुलंद हो चले है के पिछले दिनों अवैध रेत परिवहन करने वाले वाहनों को रोकने के लिए घाट के एंट्री प्वाइंट पर जो अवरोध लगाए गए थे उसे भी नुकसान पहुंचाने के साथ उखाड़ दिया गया है।
पिछले एक साल से लगातार रेत की चोरी हो रही जिस पर प्रशासन ने कई बार लगाम लगाने की कोशिश भी की पर रेत माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हो चले है के, जिले में नेशनल ग्रीन ट्रियूनल के द्वारा 15 जून से 15 अक्टूबर तक के लिए लगाए गए प्रतिबंध कालखंड में भी रेत की चोरी जिले में धड़ल्ले से जारी रही। मौजूदा स्थिति में फिर से अवैध रूप से रेत का दोहन और परिवहन चल रहा है । इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के साथ-साथ माइनिंग विभाग को भारी भरकम नुकसान हो रहा । रेत चोरी पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है, यह प्रश्न लगातार बना हुआ हैं, पर इस प्रश्न का उार न जनप्रतिनिधि के पास और न ही प्रशासन के पास है, बस यही कहा जाता है कि सब मिलीभगत से हो रहा है। ये मिलीभगत किसकी है यह भी एक प्रश्न बनकर रह गया है । इस मामले में राजनीतिक दल एक दूसरे को इसके लिए दोषी बताते हैं, लेकिन चोरी का विरोध करने कोई भी राजनीतिक दल खुलकर नहीं आया सामने, जिसका इंतजार जिले की जनता अब तक कर रही है । नतीजा ये है के जिले में शहर से लेकर कस्बाई इलाकों में रेत चोरी का कारोबार खुलेआम चल रहा है। रेत घाट स्वीकृत नहीं किए गए, इसलिए रॉयल्टी का भी कोई मतलब नहीं है। रेत चोरी इस कदर शहर में हावी है की ,किसी भी वक्त ट्रैक्टर व मिनी ट्रक में रेत ले जाते हुए देख सकते हैं। लेकिन यह चोरी उन लोगों को दिखाई नहीं देती, जिनको इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी मिली है। लेकिन उन्हें जरूर दिखाई दे जाता है जो मोबाइल हाथ में लिए यत्र तत्र घूमते दिखाई देते हैं। सूत्र बताते हैं कि ऐसे लोगों में से किसी को 200 तो किसी को ?500 प्रति माह मिल जाता है, यदि यह राशि मिलने में विलंब होता है तब यह मोबाइल धारक फिर से सक्रिय हो जाते हैं और विवश कर देते हैं रेत चोरों को महीना देने के लिए। बताया तो यह भी जाता है ,उस क्षेत्र में जो पुलिसकर्मी ड्यूटी पर तैनात होते हैं उन्हें भी इसका निर्धारित लाभ प्राप्त हो जाया करता है जिसके कारण कोई भी अवरोध उत्पन्न नहीं किया जाता और सब कुछ शांतिपूर्वक रेत चोरी के कारोबार को चलाते हुए जिले की जनता के जेबों पर डाका डाला जाता है, जिसका नतीजा यह है के जो रेत 800 में मिलनी चाहिए, उस रेत को खरीदने के लिए ग्राहकों को 2500 से 3000 रुपए प्रति ट्रैक्टर की अदायगी करनी पड़ती है इससे सरकार और प्रशासन को नुकसान उठाना तो पड़ ही रहा, वही बेचारी जनता जो बड़े आस के साथ जनप्रतिनिधि चुनते है, उनके भी विश्वास को ठेस पहुंचाया जाता है । जरूरत है के जनप्रतिनिधियों को रेत चोरी पर अंकुश लगाए और बढ़े हुए दाम को कम करे, जिससे इस महंगाई में जनता के जेबों को कुछ राहत मिल सके, न की एक दूसरे के ऊपर आरोप लगाकर अपना अपना पल्ला झाड़ते रहे ।
