एमसीबी,@सरकारी कर्मचारियों के ऊपर नियम की कई पाबंदियां पर क्या उन पाबंदियों के बेडि़यों को तोड़कर उन्हें राजनीति ही करना है?

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  • एक शिक्षिका को राजनीतिक दल के साथ उसके झंडे के नीचे विरोध प्रदर्शन की अनुमति है तो फिर अन्य कर्मचारियों के लिए पाबंदियां क्यों?
  • सरकारी कर्मचारी भी राजनीतिक कार्यक्रमों में करने लगे शिरकत
  • सत्ता का नशा इस कदर चढ़ा है कि अपनी पाबंदियों को भी नजरअंदाज कर रहे हैं कर्मचारी
  • कहीं शिक्षक ही विधायक मंत्रियों के यहां निज सचिव,कहीं विधायक महापौर के साथ पार्टी कार्यक्रम में शिक्षक रह रहे मौजूद
  • कुल मिलाकर सत्ता का जितना हो सकता है दुरुपयोग वह जारी है,कर्मचारियों को ही अब भीड़ बनाकर नेता कर रहे नेतागिरी


-रवि सिंह-
एमसीबी,28 जुलाई 2023 (घटती-घटना)। कर्मचारियों के लिए राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होना पूरी तरह वर्जित रहता है और इसके लिए बकायदा कानून है नियम है जिसके तहत यदि वह राजनीतिक कार्यक्रमों में शिरकत करते पाए जाते हैं तो उनके ऊपर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाति है और कई बार उनकी नौकरी भी छीन ली जाती है, यदि वह राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल पाए जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में वर्तमान समय में कर्मचारी ही नेता बने हुए हैं और वह खुलेआम राजनीतिक कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आ रहें हैं जिसकी बानगी एमसीबी जिले के चिरमिरी नगर निगम में देखने को मिला जहां एक महिला शिक्षक महापौर के साथ कांग्रेस पार्टी के द्वारा आयोजित किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल देखी गईं वहीं वह विरोध प्रदर्शन चाहे जिस भी उद्देश्य से हो रहा था वहां बकायदा कांग्रेस पार्टी का झंडा लहरा रहा था और उसी झंडे के साथ लोग विरोध करते आगे बढ़ रहे थे जिसमे वह शिक्षिका भी शामिल थीं।
महिला शिक्षिका जिनका नाम मिथलेश पराशर बताया जा रहा है और जो उच्च श्रेणी शिक्षक हैं चिरमिरी के ही डोमनहिल पूर्व माध्यमिक शाला में जिनकी तस्वीर और वीडियो वायरल हुआ है जिसमे वह महापौर के साथ कांग्रेस पार्टी के झंडे के साथ विरोध में अव्वल रूप में शामिल नजर आ रहीं हैं और उन्हें इस बात की कोई चिंता है की वह शासकीय कर्मचारी होने के नाते यह गलत कर रहीं हैं उनकी तस्वीर और वीडियो में उन्हे देखकर लगता नहीं है। महिला शिक्षिका जिन्हे नियम से शासकीय कर्मचारी होने के नाते कांग्रेस पार्टी के झंडे के साथ आयोजित पार्टी के द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होना था वह शामिल हैं और बकायदा वह नारा भी लगा रहीं हैं जो देखकर समझा जा सकता है। प्रदेश में वर्तमान सरकार के कार्यकाल में कर्मचारियों खासकर शिक्षकों की नेतागिरी काफी चमकी हुई भी नजर आ रही है, अधिकांश विधायक और मंत्रियों के निज सचिव शिक्षक ही हैं जबकि शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्य हेतु कहीं संलग्न नहीं किए जाने का आदेश सरकार का ही है बावजूद इसके शिक्षक बच्चों का भविष्य गढ़ने की बजाए अपना ही भविष्य संवार रहें हैं और वह विधायक मंत्रियों के साथ रहकर अपना मूल कार्य शिक्षा प्रदान करना को ही धता बता रहें हैं और बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की बजाए मौज काट रहें हैं।
महिला शिक्षिका मनेंद्रगढ़ विधानसभा की कोई इकलौती शिक्षिका नहीं हैं जो सत्ता का पूरा आनंद ले रहीं हैं
महिला शिक्षिका मनेंद्रगढ़ विधानसभा की कोई इकलौती शिक्षिका नहीं हैं जो सत्ता का पूरा आनंद ले रहीं हैं बल्कि कई ऐसे भी शिक्षक हैं जो पदस्थ तो शासकीय स्कूल में शिक्षा देने के लिए किए गए हैं शासन की तरफ से लेकिन वह कार्य विधायक मंत्रियों का झोला उठाने का कर रहें हैं और इसके एवज में उन्हें स्कूल जाने से निजात मिलती है और उन्हे घर बैठे महीने दर महीने तनख्वाह मिलती है। ऐसे शिक्षक कहीं न कहीं शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए भी जिम्मेदार हैं जिनका मन स्कूल और स्कूल की अपनी जिम्मेदारियों जिनकी वजह से उन्हें वेतन मिलता है उनका घर परिवार आसानी से जीवन यापन करता है के प्रति बिल्कुल बेफिक्र होते हैं और उन्हें नेताओं के साथ जुड़कर स्कूल जाने से छूट मिलती रहती है और वह चाटुकारिता में व्यस्त रहते हैं। चिरमिरी में महिला शिक्षिका के राजनीतिक पार्टी के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की तस्वीर सामने आने के बाद अब यह भी कहना गलत नहीं होगा की सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का क्योंकि विधायक की पत्नी जो महापौर हैं साथ ही कांग्रेस पार्टी जिसकी सरकार है उसके द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में वह शामिल हुईं हैं और जब सरकार ही उनके साथ है तो उनके ऊपर कार्यवाही कौन करेगा इस बात से वह आश्वस्त हैं और इसीलिए वह खुलेआम नेतागिरी अपनी चमका रहीं हैं जो देखा जा रहा है।
एक शिक्षिका को राजनीतिक दल के साथ उसके झंडे के नीचे विरोध प्रदर्शन की अनुमति है तो फिर अन्य कर्मचारियों के लिए पाबंदियां क्यों?
पूरे मामले में एक सवाल यह भी है की यदि एक महिला शिक्षिका को राजनीतिक दल के सात उसके झंडे के नीचे दल द्वारा ही आयोजित विरोध प्रदर्शन में यदि शामिल होने की अनुमति है तो फिर अन्य कर्मचारियों के लिए पाबंदियां क्यों और उन्हे भी उनके अनुसार क्यों छूट नहीं मिलती की वह भी अपनी अपनी इक्षा से उन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हों सकें जिनका आयोजन वह दल या पार्टी कर रही हो जिसकी विचारधारा से वह प्रेरित हो।लेकिन चिरमिरी मामले में शिक्षिका का विरोध प्रदर्शन में शामिल होना साथ ही उनके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होना बताता है की छूट सभी को नहीं मिलती खास लोगों को छूट मिलती है जो बड़े पहुंच और पकड़ वाले होते हैं और उनकी पहुंच विधायक और सरकार तक सीधी होती है वहीं वह सत्ताधारी दल के विधायक महापौर के चाटुकार होते हैं यह भी उन्हें किसी कार्यवाही से बचाता है।
चिरमिरी महापौर के साथ नजर आई शिक्षिका,कांग्रेस पार्टी के विरोध प्रदर्शन में खुलकर रहीं शामिल
चिरमिरी की शिक्षिका मिथलेश पराशर जो उच्च श्रेणी शिक्षिका हैं और जिनका काम स्कूल में जाकर बच्चों को शिक्षा देना है वह चिरमिरी में आयोजित कांग्रेस पार्टी के विरोध प्रदर्शन में शामिल नजर आईं साथ ही वह महापौर के साथ दिखीं जहां पार्टी का झंडा भी देखा जा सकता है। शिक्षिका विरोध प्रदर्शन में शामिल होकर अपनी पूरी ऊर्जा के साथ विरोध करती देखी जा सकती हैं जहां उन्होंने अन्य कांग्रेस पार्टी की महिला पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को पीछे कर रखा है जो भी देखा जा सकता है। कार्यवाही का उनके भीतर भय भी नहीं है क्योंकि साथ में क्षेत्र के विधायक की महापौर धर्मपत्नी हैं उनके और वह इस तरह निश्चिंत हैं यह भी समझा जा सकता है। कुल मिलाकर महिला शिक्षिका पूरी तरह राजनीतिक रंग में नजर आ रहीं हैं और वह एक कार्यकर्ता बनकर विरोध में शामिल हैं यह भी समझा जा सकता है।
क्या महिला शिक्षिका के विरुद्ध होगी कार्यवाही या महिला शिक्षिका बनेगी मिशाल नौकरी में रहकर नेतागिरी के मामले में?
चिरमिरी में महिला शिक्षिका कांग्रेस पार्टी के द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल नजर आ रहीं हैं और इस तरह वह शासकीय सेवक होकर नियमों की अनदेखी कर रहीं हैं जो की अनुशासन हीनता का मामला विभागीय बनता है जैसा जानकर मानते हैं,अब ऐसे में क्या महिला शिक्षिका पर अनुशासनात्मक कार्यवाही विभाग करेगा या उन्हे मिशाल बनने देगा जो एक ऐसा उदाहरण बनकर सभी के सामने होंगी जिसमे कर्मचारी को राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की छूट है यह साबित होगा। अब वैसे चूंकि मामला सत्ताधारी दल से जुड़ा हुआ है और सरकार में होते हुए क्षेत्रीय विधायक यह नहीं होने देंगे की उनकी ही पार्टी का झंडा उठाने पर किसी शासकीय कर्मचारी पर कार्यवाही हो और वह परेशान हो।
अधिकांश शिक्षक नहीं जाते स्कूल,नेताओं के खास बनकर रहते हैं उन्ही के आस पास, केवल वेतन लेते हैं शिक्षा प्रदान करने के नाम का
वैसे तो प्रदेश में भी यही हाल है लेकिन यदि अविभाजित कोरिया जिले की बात करें तो अधिकांश शिक्षक स्कूल नहीं जाना चाहते हैं और इसके लिए वह नेताओं के आसपास ही चक्कर लगाते रहते हैं,कई शिक्षक सालों से स्कूल से नदारत हैं,जाते भी हैं तो हाजिरी लगाने जिससे वेतन मिल जाए और घर में राशन पानी का जुगाड हो जाए,ऐसे शिक्षक केवल वेतन लेने के लिए विभाग में भर्ती हुए हैं,विधायक मंत्रियों के यहां संलग्न होकर वह स्कूल जाने से बचते चले आ रहें हैं और घर बैठे वेतन पा रहें हैं,अविभाजित कोरिया जिले में ऐसे शिक्षकों की संख्या काफी अधिक है वहीं कुछ किसी के यहां संलग्न नहीं हैं फिर भी घूमते नजर आते हैं और घर बैठे वेतन उठाते हैं।
क्या इसी तरह शिक्षक जलाएंगे शिक्षा का दीप,नौकरी के नाम पर क्या लेते रहेंगे वेतन मात्र,स्कूल से रहेंगे नादरत?
जिले में शिक्षकों की नेतागिरी चरम पर है,अधिकांश शिक्षक नेतागिरी के नाम पर नेताओं के खास होने के नाम पर स्कूल से नदारत रहते हैं,अब ऐसे में सवाल उठता है की क्या इसी तरह स्कूल छोड़कर और केवल वेतन लेने के लिए हाजिरी लगाने मात्र स्कूल जाने वाले शिक्षक इसी तरह शिक्षा का दीप जलाएंगे। क्या वह अपना मूल काम छोड़कर बस नेतागिरी ही करते रहेंगे यह बड़ा सवाल है। इस ओर न तो अधिकारी ध्यान दे रहे और न ही वह जनप्रतिनिधि जो आम जनता से वादा करते हैं की वह उनकी बेहतरी के लिए काम करेंगे। जबकि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मसले पर दोनो मौन हैं और शिक्षक नेतागिरी करते नजर आ रहें हैं।
शिक्षकों से गैर शिक्षकीय कार्य लेना है शासन की तरफ से मना,फिर भी शिक्षक हैं गैर शिक्षकीय कार्य में संलग्न,कौन देगा ध्यान? शिक्षकों की नेतागिरी से जुड़ा मामला उनका गैर शिक्षकीय कार्य में संलग्न होना भी है,कई शिक्षक नेताओं के यहां चकिरदारी कर रहें हैं जबकि शासन का ही सख्त निर्देश है की शिक्षक शिक्षा के लिए संलग्न भले किए जाएं गैर शिक्षकीय कार्य के लिए उन्हें संलग्न न किया जाए,अब नेताओ के चकिरदार शिक्षकों को कौन उनके मूल जगह मूल कार्य पर वापस भेजेगा जिसका वह वेतन ले रहे हैं यह भी बड़ा सवाल है।


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