1993 में भी हुआ था सांप्रदायिक दंगा
नागा और कुकी समुदाय के बीच हुई झड़प में मारे गए थे 750 लोग
इस दंगे ने पूरे गांव और जिलों को नष्ट कर दिया था
नई दिल्ली,28 जुलाई 2023 (ए)। पिछले कई महीनों से मणिपुर जल रहा है, हर तरफ तबाही, आगजनी, दंगे और अफरा-तफरी का माहौल है। कुकी और मैतेई समुदाय के लोगों के बीच एक विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ बवाल आज पूरे राज्य को आग में झोंक चुका है।
अब तक इस दंगे में लगभग 160-170 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हो चुके हैं। हर तरफ स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल के कर्मचारी भारी मात्रा में तैनात हैं, वहीं कई लोग आज भी अपने घरों से निकलने में डर रहे हैं।
हालांकि, आपको बता दें, ऐसा पहली बार नहीं है। इससे पहले भी दो समुदायों के बीच रक्तपात हो चुका है, इससे पहले भी प्रदेश आग में जल चुका है और तबाही का मंजर देख चुका है। इस दंगे के बारे में आज भी बहुत-से लोग नहीं जानते हैं, जिसका बहुत बड़ा कारण था कि उस दौरान न तो इंटरनेट था और न ही कोई ऐसा समाचार चैनल था, जो 24 घंटे लोगों तक जानकारी पहुंचा सके।
इस खबर में हम आपको बताएंगे कि दंगों से मणिपुर का क्या कनेक्शन रहा है और इससे पहले कितनी बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है। इससे पहले 1993 में नागा और कुकी समुदाय के लोगों के बीच भी काफी भीषण दंगा हुआ था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे और माना जाता है कि अगर उस दौरान राष्ट्रपति शासन लागू नहीं किया गया होता, तो दंगे को संभालना थोड़ा मुश्किल हो सकता था।
मणिपुर में 1993 का दंगा
साल 1993 में मणिपुर हिंसा के दौरान राज्य में नागा और कुकी समुदाय आमने-सामने हुए थे। उस दौरान 10-20 और 50 नहीं, बल्कि सैकड़ों लोग मारे गए थे। कुछ आंकड़े बताते हैं कि लगभग 700 लोग, तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इसमें अनगिनत लोग मारे गए थे।
कुकी समुदाय से नाराज थे नागा समुदाय के लोग
नागाओं और अल्पसंख्यक कुकी समुदाय के बीच संघर्ष इतना खूनी हो गया था कि इसमें बहुत कम समय में ही 85 लोगों की जान चली गई और पूरे के पूरे गांव जलाए जाने लगे। कुकी और नागा, दोनों ही ईसाई समुदाय के बीच जातीय शत्रुता जेनोफोबिक असुरक्षा से शुरू हुई थी। स्थानीय नागा इस बात से नाराज थे कि कुकी समुदाय के लोगों द्वारा उनकी भूमि पर अतिक्रमण कर लिया गया है। दरअसल, नागा हमेशा से कुकी समुदाय के लोगों को विदेशी मानते थे।
हालांकि, कुछ कुकी तब से मणिपुर में रह रहे हैं, जब उन्हें 18वीं शताब्दी में बर्मा के चिन हिल्स में अपनी मातृभूमि से बाहर निकाल दिया गया था। आज राज्य की 18 लाख की आबादी में 2.5 लाख कुकी समुदाय के लोग हैं, जबकि नागाओं की संख्या 4 लाख है।
पूरी तरह से नष्ट हो गए थे गांव
उस दौरान भड़की हिंसा में 28 गांव, जिनमें से दो-तिहाई नागा थे, वो पूरी नष्ट हो गए। चंदेल, सदर हिल्स और उरखुल जिलों में गांव के गांव तबाह हो गए और मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। शरणार्थी शिविरों में रह रहे निवासियों को सुरक्षा के मद्देनजर खाली कर दिया गया।
शरणार्थियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल हो रहा था, क्योंकि जिस रास्ते से लेकर उन्हें गुजरना था, वो पूरी तरह से उग्रवादी इलाका माना जा रहा था। सड़क का यह हिस्सा प्रतिद्वंद्वी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन-एम) और बर्मा स्थित कुकी नेशनल आर्मी (केएनए) के विद्रोहियों के नियंत्रण में था।
खुले मैदान में रहने को मजबूर थे नागा शरणार्थी
एक खुले मैदान में लगभग 300 नागा शरणार्थी को रखा गया था, क्योंकि कुकी विद्रोहियों द्वारा उनके गांवों पर किए गए हमले के बाद वे बेघर हो गए थे। पुरुष महिलाओं को उनके हाल पर छोड़कर जंगलों में भाग गए थे।
लोगों में इस हद तक डर बैठा हुआ था कि जब सुरक्षा बल उनकी मदद के लिए गांव में पहुंचते थे, तो उस दौरान नागा परिवार के लोग अपनी झोपड़ी से बाहर नहीं निकलते थे, क्योंकि उन्हें लगता था ये कुकी समुदाय के लोग हैं और उनके झोपड़ी और परिवार को तहस-नहस कर देंगे।
कुकी समुदाय पर भी हुए हमले
वहीं, दूसरी ओर कुकी गांव सीता में सब कुछ उल्टा था। घात लगाकर किए जाने वाले हमलों को रोकने के लिए सेना ने दोनों तरफ के जंगलों को साफ कर दिया और ग्रामीणों ने संभावित नागा हमलों के खिलाफ अस्थायी बैरिकेड्स लगा दिए थे। नागाओं ने इस गांव पर हमला किया और लगभग 25 झोपडç¸यों में आग लगा दी। एनएससीएन (एम) के ग्रेटर नागालैंड के आह्वान से कुकियों की असुरक्षा की भावना बढ़ गई थी।
सामना करने के लिए कुकी महिलाओं ने उठाए हथियार
नागा हमलों का मुकाबला करने के लिए कई कुकी महिलाओं ने हथियार उठा लिए थे। संघर्ष की इस चल रही लड़ाई में, जिसने मणिपुर को विद्रोहियों के खेल के मैदान में बदल दिया था, पांच पहाड़ी जिलों का शायद ही कोई गांव इससे अछूता रह पाया था। कम्बांग खुलेन, एक खड़ी पहाड़ी पथ पर स्थित नागा गांव, लगभग दुर्गम लगता है, यह भी जातीय रोष से अछूता नहीं था।
राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग
मणिपुर में लगी आग की खबर अब राजनीतिक गलियारे में भी गूंजने लगी थी। इस हिंसा के दौरान राजकुमार दोरेंद्र सिंह मणिपुर के मुख्यमंत्री थे। उस वक्त नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की।
सीएम दोरेंद्र को बताया विफल
हालांकि, उस दौरान गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट (कांग्रेस नेता सचिन पायलट के पिता) तीन घंटे के लिए मणिपुर दौरे पर गए थे, जिसमें दो घंटे वो एयरपोर्ट पर रुके और एक घंटे में उन्होंने दौरा करने के बाद कहा था कि मणिपुर के सीएम दोरेंद्र सिंह राज्य में प्रशासन लागू करने में विफल रहे हैं। यहां हैरान करने वाली बात यह है कि उस दौरान मणिपुर में कांग्रेस की ही सरकारी थी।