- अब नेताओं की मजबूरी है की उन्हे एयर कंडीशनर गाडि़यों से नीचे उतरना पड़ रहा है
- क्या दोबारा फिर सुख भोगने के लिए जमीन वाले जनता की आ गई याद?
- पांचवे साल विधायक नजर आने लगे जमीन पर,जनता के साथ खास से आम बनकर घुलमिल रहे विधायक
- दोबारा सुख भोगने के लिए कड़ी धूप में भी लोगों के बीच पहुंच रहे विधायक
- चुनाव जीतने के साढ़े चार सालों बाद विधायकों को जनता की आई याद

–रवि सिंह –
बैकुण्ठपुर 17 जून 2023 (घटती-घटना)। आमिर खान की पॉपुलर फिल्म तारे जमीन पर तो आपने जरूर देखी होगी, इस फिल्म में आमिर खान के साथ नन्हे ईशान के रोल में दर्शील सफारी नजर आए थे, 2007 में आई यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी यह फिल्म एक बच्चे पर आधारित है, जिसे पढ़ाई में मन नहीं लगता था पर उसके अंदर कुछ और भी हुनर था जो लोगों को दिख नहीं रहा था, पर उसकी हुनर को एक शिक्षक ने भली-भांति समझा और उसे प्रोत्साहित किया और वह लड़का आसमान की ऊंचाइयों को छूता दिखा ऐसा माने तो आसमान का तारा जमीन पर आ गया, यह तो एक फिल्म की कहानी है पर यदि राजनीति से इसे जोड़ा जाए तो बेहुनर वाले नेता जनता का प्यार पाकर आसमान पर उड़ने लगे हैं, पर यह भूल गए कि यह आसमान भी आपको किसी और ने दिया है, पर अब जब आसमान से नीचे गिरने की बारी आई है तो दोबारा आसमान कैसे मिले इसकी तलाश में फिर से भोले वाले जनता को अपने जाल में फंसाने के लिए जमीन पर उतर आए हैं और उन्हें बता रहे हैं कि हम आपके लिए 5 साल में क्या-क्या किए हैं, पर यह नहीं बता रहे कि हम आपको 5 साल में कितना परेशान किए हैं, सुविधाओं के साथ आपको परेशानियां कितनी हुईं हैं, सुविधाओं के नाम पर आपको परेशानी कितनी थी। चुनाव में सिर्फ चंद महीने बचे हैं और कम दिनों को देखते हुए नेता अब आसमान के तारों को जमीन पर तलाशने लगे हैं।
आजकल नेताओं को कड़ी धूप में लोगों से आम व्यक्ति की तरह बनकर मिलना पड़ रहा है। जिन नेताओं ने पूरे साढ़े चार सालों तक आम जनता से खास बनकर मुलाकात की, बड़ी बड़ी एयर कंडीशनर गाडि़यों से जनता तक पहुंचे बड़े कार्यक्रम आयोजित कर खुद ही फूल माला पहनी और लोगों की भीड़ जुटाकर अपने लिए तालियां बजवाईं, वह आज खुद चिलचिलाती धूप में जनता के साथ नजर आ रहे हैं, आए भी क्यों नहीं चुनाव का वक्त जो समीप आ चुका है। साढ़े चार सालों से जो नेता हर सुख सुविधा भोग रहे थे और जिन्हे जनता की तकलीफों से कोई वास्ता नहीं था, उनके अचानक जमीन पर उतरने का कारण भी है, चुनाव जो नजदीक है अब जनता की बारी जो आ चुकी है, अब नेताओं की मजबूरी है की उन्हे आम बनकर लोगों के बीच जाना होगा और उन्हे जतलाना होगा की वह उनके हितैसी हैं वरना जनता ने यदि मुंह फेर लिया तो पूरी सुख सुविधा समाप्त हो जायेगी और हार का सामना करना पड़ सकता है, ऐसे में अब नेताओं की मजबूरी है की उन्हे एयर कंडीशनर गाडि़यों से नीचे उतरना पड़ रहा है।
अधिकारियों की पैरवी से लगता है नेताओं को मिल गई फुर्सत
विधायक जिस तरह अब जमीन पर नजर आ रहें हैं और जिस तरह वह जनता से संवाद कर रहें हैं उससे लगता है की उन्हे अब अधिकारियों की पैरवी से फुर्सत मिल गई है। अधिकारियों के साथ पूरे साढ़े चार साल जुगलबंदी करके चल रहे विधायक अब चुनाव करीब आते ही जनता की समस्या जानने की कोशिश कर रहें हैं और उन्हे दूर करने की बात कह रहें हैं जबकि जन समस्या ज्यादातर शासकीय विभागों से ही जुड़ी हुई हैं और उनका निराकरण भी वहीं से होना है और उन विभागो में कार्यरत अधिकारी कर्मचारी से नेताओं की जुगलबंदी लगातार चली आ रही है ऐसे में समस्याओं का निराकरण होगा यह एक सवाल है।
पहले से ही दिया गया होता ध्यान तो जन समस्याएं सामने ही नहीं आतीं
वैसे राजनीति भी अजीब चीज है नेताओं को जब वोट लेना होता है तब उन्हे जन समस्याओं की याद आती है,जबकि जब उन्हे जनता चुनकर निर्वाचित करती है वह पूरे कार्यकाल में जन समस्याओं की तरफ ध्यान ही नहीं देते और जनता अपनी समस्याओं को लेकर परेशान ही रहती है। यदि निर्वाचित नेता ही निर्वाचित होने के साथ ही जन समस्याओं का ध्यान रखते समस्याओं का समाधान होता रहता और लोगों को परेशान नहीं होना पड़ता वहीं नेताओं को भी चुनाव के समय जन समस्याओं को लेकर जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती।
आखिर नेताओं को अपने कार्यकाल के दौरान जन समस्याओं का क्यों नहीं रहता ध्यान
सवाल यह भी है की जिन नेताओं को जनता चुनकर अपने लिए कुर्सी पर बैठाती है उन्हे अपने कार्यकाल के दौरान जन समस्याओं का ध्यान क्यों नहीं रहता है। वह पूरे कार्यकाल के दौरान जो की पांच वर्ष का रहता है उसमे साढ़े चार साल कहां रहते हैं और किस दुनिया में खोए रहते हैं,नेताओं को जब साढ़े चार साल बीत जाने का एहसास होता है वह सक्रिय हो जाते हैं और जनता के बीच जाकर खुद को जन हितैसी बताने जमीन पर उतरकर जनता की सहानुभूति जुटाने में लग जाते हैं।
निर्वाचित होते ही जनप्रतिनिधियों का पहला ध्येय निर्माण कार्य होता है,धनार्जन करने में ही लग जाते हैं जनप्रतिनिधि
प्रायः देखा गया है की जैसे ही कोई जनप्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होता है उसका पहला ध्येय निर्माण कार्य होता है और वह धनार्जन में लग जाता है यह आम बात हो गई है। जनप्रतिनिधि निर्माण कार्यों से ही केवल अपनी उपलब्ध बताने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं,उन्हे अन्य किसी मामले में उपलब्ध बताने कहा जाए तो शायद ही वह बता पाएं। कुल मिलाकर जहां लाभ का विषय होता है वहीं जनप्रतिनिधियों की भी रुचि होती है व्यक्तिगत जन समस्याएं जनप्रतिनिधियों के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं यह सर्वविदित है।
कड़ी धूप में जमीन पर उतर आए नेता,क्या जनता का मिलेगा उन्हें समर्थन
अब जबकि चुनाव में काफी कम समय बचा है और अब जनता भी अपने लिए नई सरकार चुनने विचार करने लगी है ऐसे में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी कड़ी धूप में जमीन पर उतरकर आम लोगों के बीच पहुंचते देखा जा रहा है। अब देखना यह होगा की साढ़े चार सालों तक एयर कंडीशनर गाडि़यों में ही चलने वाले नेताओं के जमीन पर उतरने का आम लोगों पर प्रभाव पड़ता है की नहीं उनका उन्हे समर्थन मिलेगा या नहीं।
नेताओं के साथ साथ समर्थक भी हो गए चार पहिया एयर कंडीशनर गाडि़यों के मालिक,जनता की समस्या जस की तस
साढ़े चार सालों में निर्वाचित जनप्रतिनिधि के साथ साथ उनके समर्थकों के पास भी चार पहिया एयर कंडीशनर गाडियां हो गईं लेकिन आम जनता की यदि बात की जाए तो उनकी समस्या जस की तस हैं और आवेदनों की भरमार है। यह सतत चली आ रही राजनीतिक एक परंपरा है जहां आम आदमी परेशान ही रहने वाला है और जनप्रतिनिधि और उनके समर्थक निर्माण कार्यों में ही व्यस्त हैं।