कोरिया/एमसीबी@उत्पादन की होड़ में जान की परवाह किसे है..बेतहाशा दुर्घटनायें बढ़ रही है : अख्तर जावेद उस्मानी

Share

  • सैकड़ों श्रमिकों को खनन कार्यों से संबंधित यवसायिक बीमारियों में क्षतिपूर्ति नहीं दी जा रही है..करोड़ों रुपये बचाने में लगी है कोल इंडिया
  • देश के कानून की स्पष्ट मंशा मजदूरों को सहायता पहुंचाने की पर कोल इंडिया का इस और कोई ध्यान नहीं
  • 1952 से आज तक कोयला खदानों में कभी आक्यूपेशनल हेल्थ सर्वे क्यों नहीं कराया गया है?


-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,10 जून 2023 (घटती-घटना)। त्रिपक्षीय सुरक्षा समिति कोल इंडिया लिमिटेड में हिन्द मजदूर सभा के प्रतिनिधि कोल इंडिया लिमिटेड और उसकी सब्सिडियों में सैकड़ों श्रमिकों को खनन कार्यों से संबंधित ब्यवसायिक बीमारियों में क्षतिपूर्ति नहीं दी जा रही है। करोड़ों रुपये बचाने में लगी है कोल इंडिया लिमिटेड जबकि देश के कानून की स्पष्ट मंशा मजदूरों को सहायता पहुंचाने की है। कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 में नोटिफाइड डिज़िजेज़ को चोट और प्राणघातक दुर्घटना तक माना गया और  अधिनियम की धारा 2 के अनुरूप खदान मजदूरों को  शेड्यूल के उपबंध वी के अनुसार कम्पेनसेशन का अधिकारी माना गया है। शेड्यूल 3 के पार्ट सी में ब्यवसायिक बीमारियों का उल्लेख है जिसमें समय समय पर भारत सरकार द्वारा गजट नोटिफिकेशन के द्वारा ब्यवसायिक बीमारियों  को जोड़ा जाता रहा है। सिलिकोसिस को भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के नोटिफिकेशन न. एमआई- 41 (74) दिनांक 18 दिसंबर 1956 के द्वारा ब्यवसायिक बीमारी माना गया था। इसी प्रकार नोटिफिकेशन न० 2521 दिनांक 26 जून 1986 को एस्बेस्टोसिस और लंग कैंसर,  स्टमक कैंसर, पेलुरा में कैंसर और मेसोथियोलोमा को तथा नोटिफिकेशन न० 399 दिनांक 21 फरवरी 2011 से शोर के कान में सुनने की क्षमता में हानि आदि को भी ब्यवसायिक बीमारी माना है।
अख़्तर जावेद उस्मानी ने बताया कि भारत में क्षतिपूर्ति की राशि अत्यंत अल्प है। 18 साल के मजदूर की मृत्यु की दशा में अधिकतम 18 लाख 11 हजार चालीस और साठ साल के मजदूर की मृत्यु की दशा में  7 लाख 94 हज़ार नौ सौ साठ रुपये क्षतिपूर्ति मिलती है। मजदूरों के मरने पर मिलने वाला 15 लाख की अनुग्रह राशि में ब्यवसायिक बीमारियों से मृत्यु में नहीं दिया जाता है। उन्होंने बताया कि 2018 में कोल इंडिया लिमिटेड की त्रिपक्षीय सुरक्षा समिति में हिन्द मजदूर सभा की ओर से नियुक्त किये जाने के बाद उन्होंने भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, सेन्ट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड तथा साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों में जाकर यह देखा कि हर खदान मे औसतन पांच आदमी मशीनों के शोर से सुनने की क्षमता को खो रहे हैं परंतु उसी शोर में काम करने को मजबूर हैं। फेफड़ों के कैन्सर में  पिछले चार सालों में बीसीसीएल में 57, सीसीएल में पांच और एसईसीएल में 2023 में 13 स्थायी मजदूर पीड़ित हैं। लेकिन बीमारी ग्रस्त मजदूरों को कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जा रही है। न ही डायरेक्टर जनरल आफ माइंस सेफ्टी को माइन्स एक्ट 1952 की धारा 25 के अनुरूप सूचित किया जा रहा है। एस ई सी एल में  339 विभिन्न प्रकार के कैन्सर के मरीज हैं जिनमें 115 कर्मचारी और शेष उनके आश्रित है। सात अधिकारी भी कैन्सर पीड़ित हैं। इनमें 13 फेफड़ों के कैन्सर से पीड़ित हैं। अख़्तर जावेद उस्मानी ने कहा कि 115 कर्मचारियों में से 13 लंग कैंसर केस कुल संख्या का 8.85 प्रतिशत है जो भयावह है। 
उत्पादन की होड़ में जान की परवाह किसे है
उत्पादन की होड़ में जान की परवाह किसे है। बेतहाशा दुर्घटनाये बढ़ रही है। जब मजदूर की जान की कीमत अधिकतम 18 लाख हो तो अरबों रुपये प्रतिवर्ष लाभ कमाने वाली कंपनियों को फ़र्क नहीं पड़ता है। ऐसे में खानों में शोर से, ब्लास्टिंग की नाक वेबस् से पैदा बहरेपन और खानों कोयले की धूल के शिकार कैन्सर मरीज जीवन की गुणवत्ता को खो कर कैन्सर से तिल तिल मर रहे स्थायी मजदूरों को कम्पेनसेशन तक नहीं दिया जा रहा है। अगर औसत में 10 लाख कम्पेनसेशन माने तो ये तीन कंपनियों ने 7.5 करोड़ कम्पेनसेशन के बचा लिये और 1986 से अगर डेटा मिल पाये तो क्षतिपूर्ति अरबों में जायेगी। कोल इंडिया लिमिटेड की एनसीएल, डब्लू सीएल, सीएमपीडीआईएल, एमसीएल और ईसीएल का विवरण अभी नहीं मिल पाया है। ठेकेदारी मजदूरों की बीमारियों और उनके इलाज का डेटा कोल कंपनियां रखती ही नहीं कहीं भी उनके साथ मनुष्य मान कर यवहार भी नहीं किया जा रहा है।
1952 से आज तक कोयला खदानों में कभी आक्यूपेशनल हेल्थ सर्वे क्यों नहीं कराया गया है?
वेज बोर्ड में चोट लगने पर पूरा वेतन देने का प्रावधान है। लेकिन लंग कैंसर पेशेंट्स को पूरे कोल इंडिया लिमिटेड में स्पेशल लीव के नाम पर आधा वेतन दिया जा रहा है। जब महारत्न और मिनी रत्न पब्लिक सेक्टर कंपनियों जिनका मालिकाना भारत सरकार के पास है उनका ये हाल है तो प्राईवेट मालिकों के व्यवहार के बारे में सोच कर दिल दहल उठता है। 1952 से आज तक कोयला खदानों में कभी आक्यूपेशनल हेल्थ सर्वे नहीं कराया गया है जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान की खानों और गुजरात के मोतियों की पालिश करने वाले मजदूरों की सिलिकोसिस से दुर्दशा सामने के बाद डीजीएम एस ने धातु और पत्थर की खानों में माइन्स एक्ट 1952 की धारा 9अ के तहत आक्यूपेशनल हेल्थ सर्वे करवाया और सैकड़ों की संख्या में सिलिकोसिस के मरीजों को चिन्हित किया है।
अख़्तर जावेद उस्मानी ने मजदुरो हित के लिए की मंगा
अख़्तर जावेद उस्मानी ने प्रधानमंत्री, कोयला मंत्री, श्रम मंत्री भारत सरकार को सूचना देते हुये डीजीएमएस और चेयरमैन कोल इंडिया लिमिटेड से मांग की है कि भारत सरकार के 1986 और 2011 की अधिसूचना के अनुसार सभी पीडि़त श्रमिकों को क्षतिपूर्ति दी जाये। वेज बोर्ड के समझौतों के अनुरूप यवसायिक बीमारियों को चोट मान कर इंज्यूरी आन ड्यूटी जैसा न्यूमोकोनियोसिस के केस में किया जाता है उन्हें पूरा वेतन देने तथा मेडिकल अनफिट घोषित करने की मांग की है।


Share

Check Also

रायपुर@ पीएटी पीव्हीपीटी,पीईटी प्रवेश परीक्षा 2025 के लिए आवेदन 17 से 21 के बीच

Share रायपुर,06अप्रैल 2025 (ए)। व्यावसायिक परीक्षा मंडल ने शैक्षणिक सत्र 2025 के लिए पी.ए.टी. एवं …

Leave a Reply