कठोरी पूजा के नियम तोड़ने पर एस.ई.सी.एल. विश्रामपुर को भरना पड़ा जुर्माना
रामानुजनगर,15 अप्रैल 2023 (घटती-घटना)। अंचल मे ग्राम कठोरी पूजा का विशेष महत्व हैं कठोरी पूजा देवगुड़ी स्थल, देवालयों में ग्राम बैगाओं के द्वारा पूर्जा अचना किया जाता हैं । बैषाख माह के पहले ग्राम के बैगाओं के द्वारा अच्छी फसल, अच्छी बरसात की कामना के साथ भगवान महादेव और मॉ पार्वती जी का पूजा किया गया जाता हैं। मान्यता हैं कि पूजा के दिन जब तक बैगाओं के द्वारा रास ढ़ोड़ी की पूजा नही कर लेते तक तब किसी भी धर मे पानी नही भरा जाता हैं पानी की व्यवस्था ग्रामिणों के द्वारा एक दिन पहले की कर लिया जाता हैं तथा गॉंव के भूमि पर किसी प्रकार का खुदाई – जोताई का काम नही किया जाता हैं वही आज भी ग्रामिण क्षेत्रों मे इसका पालन किया जाता हैं और पालन नही करने वालों पर गॉव मे बैठक कर उचित दण्ड व जुर्मा लिया जाता हैं।
कठोरी पूजा का मान्यता अनुसार ग्राम पंचायत पटना में कठोरी पूजा दिन एस.ई.सी.एल विश्रामपुर क्षेत्र के द्वारा सी.आर.एस. के द्वारा स्कूली बच्चों के लिए पौष्टिक आहार वितरण का कार्यक्रम का आयोजन किया गया और आयोजन में एस.ई.सी.एल प्रबंधन के द्वारा ग्राम पंचायत पटना से किसी भी प्रकार की सहमती नही लिया गया था, और ना ही जानने का प्रयास किया गया कि कठोरी पूजा मे आयोजन किया जा सकता हैं या नही । जिस कारण पूजा से पहले ही एस.ई.सी.एल विश्रामपुर के अधिकारियों के द्वारा भेजे गये टंेट आदि लगाने के लिए टेंट के कारीगरो के द्वारा टेंट लगाने के लिए जमीन मे गढ़ड़ा खोदने लगें जब इस बात कि जानकारी लोगों को हुआ तो उनके द्वारा इस संबंध मे ग्राम के सरपंच व अन्य वरिष्ठ लोगों को दी और उन्होंने इसे रोकने के लिए कहा किन्तु तब तक टेंट के लिए गढड़ा खोदा जा चुका था। इस पर ग्रामीण काफी अधिक आक्रोसीत हो गयें और एस.ई.सी.एल. प्रबंधन का विरोध करने लगें। मामला को किसी प्रकार शांत कर पंचायत बैठाया गया जिसमें निर्णय लिया गया कि कठोरी पूजा के नियम को प्रबंधन के द्वारा तोड़ा गया हैं और उन्हे जुर्माना अदा करना होगा। इसके बाद कठोरी पूजा संपन कर स्कूली बच्चों मे पौष्टिक आहार का वितरण किया गया।
आईये जाने क्या हैं कठोरी पूजा
चूकि सरगुुजा क्षेत्र वनवासी – आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के साथ अनेक लोक संस्कृति और अनेको त्यौहार व पर्व मनाया जाता हैं उसी मे कठोरी इस पूजा को मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही हैं। प्रतिवर्ष कठोरी पूजा मई माह के अंतिम तक अंचल के गांवों मे कृषक के द्वारा पूरे उत्साह एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। इस दिन ग्राम के बैगाओं के द्वारा देवस्थान की पूजा कर गौरा, महादेव, इन्द्र देव , वरूण देव, पृथ्वी, अन्नपूर्णा, रास बढ़ाव देव धान के रूप में माता अंन्नपूर्णा आदि देवी देवताओं कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा की जाती हैं, इसी समय ग्रामीण क्षेत्रों मे बायान नाचा का भी आयोजन किया जाता हैं। पूर्व के समय कठोरी पूजा के एक दिन पहले कोटवार के द्वारा पूरे गॉंव मे मुनादी किया जाता था कि उमुख दिन कठोरी पूजा किया जाना तय हुआ किसी भी व्यक्ति के द्वारा पूजा हुए बिना रास ढ़ोढ़ी (गॉव का मुख्य जल स्रोत) का पानी नही भरेगा और नाही जमीन की जुताई – खुदाई आदि कार्य करेगा। पूर्व मे ग्राम बैगा के द्वारा राजमहल पहुच कर देवी स्वरूप् रास बढावन घान से भरे कठौती देकर गौरा – महोदव के पूजा स्थल पहुच कर बैगा के द्वारा विधि विधान से गौरा – महादेव, इन्द्र देव, वरूण देव, पृथ्वी मॉ , अन्नपूर्णा देवी आदि देवी देवताओं का आवाहन कर पूजा किया जाता हैं। पूजा करने के बाद किसान वर्ग के व्यक्ति के गले में चावल आटे से बनी रोटी के बीच मे छेद कर रस्सी बांध दिया जता है, किसानों के द्वारा लाए धान को थोड़ा थोड़ा धान निकाल कर बांस की टोकरी मे इकढ्ठा किया जाता हैं और उस धान को एक निष्चित व्यक्ति के द्वारा देवस्थल के चारों ओर बोया जाता है एक दिन पहले रात मे रास ढ़ोढी से लाए गए ज लमे नीम के डाली से पानी का छिड़काव अन्य व्यक्ति के द्वारा उस भूमि पर किया जाता हैं। उसके बाद किसान हल के लोहे (फ ाल) को हाथ मे लेकर भूमि जोतते हुए देवस्थल की पॉच बार परिक्रमा लगाते हैं जिल व्यक्ति के गले में रोटी बंधी हुइ होती है वह एक दिषा की ओर भागता है उस रोटी को छीनने के लिए हल जोत रहे किसान लोग भी पीछे भागते है और पूजा स्थल से दूर जाने के बाद रोटी को आपस में बाट कर खाते है।
इसके बाद ग्राम बैगा द्वारा हवन किया जाता है कि अनिष्टकारी जीव – जन्तुओं के द्वारा के द्वारा फसलो को नुकसान ना पहुचाया जाये इसलिए उनके नाम से छोटी – छोटी पत्थरों की पोटली बांधा जाता है बैगा के द्वारा पूजा करने के बाद उसे अपने सिर के ऊपर से पीछे फेंका जाता हैं किसानों के द्वारा उन पोटली को पकड कर गड़्ड़ा से दफन कर दिया जाता हैं। इसके बाद छुरी पाठ देवता का महुआ शराब से तर्पण किया जाता हैं फिर उपस्थित लोग व किसानों को प्रसाद के रूप् मे नारियल का वितरण किया जाता हैं। शाम के समय बैंग अपने सहयोगियों के साथ सभी धर – धर जाकर रास पानी का वितरण किया जाता हैं रास पानी का छिड़काव लोगों के द्वारा अपने – अपने घरो में करते है जिससे उनके घर धन – संपदा की वृद्वि हो। जिसके बदले किसान बैगो को दक्षिणा स्वरूप चावल, दाल, रूपये – पैसे देते हैं। इस प्रकार कठोरी पूजा का समापन होता हैं। पूजा किये गये धान को किसानों को वापस कर दिया जाता हैं जब फलस की बोआई आदि कार्य आरंभ होता हैं जिसे मूठ लेना कहा जाता हैं । मूठ लेने के पीछे भी एक रहस्य हैं – जब किसान पूजा किये धान को खेत मे बोने के लिए जा रहा होता है उसे कोई दूसरा व्यक्ति ना देखे इस कारण बैगा के द्वारा पूजा किये गये धान को मध्य रात्रि में बोने की परंपरा हैं यदि किसी कारण कोई व्यक्ति देख लेता है तो उसे अषुभ समझा जाता हैं। उन पूजा किये गये धान को सर्व प्रथम किसानों के द्वारा बोया जाता हैं। जिसके बदले किसान बैगो को दक्षिणा स्वरूप चावल, दाल, रूपये – पैसे देते हैं। इस प्रकार कठोरी पूजा का समापन होता हैं।
नियत न मानने पर दंड का भी प्रावधान होता हैं पूर्व काल में कठोरी पूजा के लिए कुछ कठोर नियम व शर्ते बनाई गई थी जिसे सभी को मानना पड़ता था यदि किसी व्यक्ति के द्वारा पूजा से पहले जमीन की खुदाई या रास ढ़ोढी से कठोरी पूजा संपन्न हुए बिना पानी भरने की गलती हो जाती थी तो उससे दण्ड के रूप मे एक बकरा लिया जाता था। कठोरी पूजा के दिन बायार नृत्य का भी आयोजन किया जाता हैं किसान ढोल – नगाड़ों के साथ बायर नृत्य करते है इसी गौरा नृत्य भी कहा जाता हैं।