- क्या कोरिया में बिखर गया कांग्रेस संगठन, अलग-थलग पड़े वरिष्ठ नेता?
- चुनावी वर्ष में हार कांग्रेस के लिए चिंता का विषय
- क्या सलाहकारो ने डुबो डाली है अंबिका सिंहदेव की लुटिया?
-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर 15 जनवरी 2023 (घटती-घटना)। कोरिया जिला कांग्रेस में सबकुछ ठीक नही चल रहा है, न तो संगठन काम कर पा रहा है और न ही सत्ता, दोनो मे आपसी समन्वय का जबरजस्त अभाव। जिलाध्यक्ष के बारे में तो लगता है कि वे सिर्फ स्टांप पैड का काम कर रहे हैं। तो वहीं संपन्न हुई जिला पंचायत सदस्य चुनाव में कांग्रेस की करारी हार स्थानीय विधायक और संसदीय सचिव अंबिका सिंहदेव के नेतृत्व पर अब सवालिया निषान लगा रहा है, कांग्रेस संगठन वास्तव में बिखरा हुआ नजर आ रहा है, जो बिखराव भाजपा में देखा जाता था इस चुनाव में उसमें एकजुटता देखने को मिली, सभी नेताओं ने आपसी समन्वय के साथ काम कर बेहतर रिजल्ट दिया, चुनाव परिणाम ने पूर्व मंत्री भैयालाल राजवाड़े को एक बार फिर से स्थापित किया है तो वहीं भयंकर गुटबाजी की भेंट चढी कांग्रेस को चुनावी वर्ष में हार महंगी पड़ने वाली है। चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए चिंता का विषय तो है ही उससे ज्यादा आपसी फूट और समन्वय की कमी से कांगे्रस एक बार फिर गर्त में चली गई है इससे इंकार नही किया जा सकता। बहुत बड़ा और गंभीर सवाल यह भी है कि क्या संसदीय सचिव अंबिका सिंहदेव के इर्द-गिर्द रहने वाले सलाहकारो के कारण ही उनकी लुटिया डूब रही है। वास्तव मे जिला पंचायत सदस्य का चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए परेषानी का सबब बन गया है।
अंबिका के नेतृत्व में कांग्रेस की लगातार हार
बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है, जबसे विधायक के रूप में जनता ने श्रीमती अंबिका सिंहदेव को चुना है तबसे कांग्रेस को अधिकांश चुनाव में हार का सामना ही करना पड़ा है। उनके विजयी होने क बाद जनपद पंचायत बैकुंठपुर में भाजपा समर्थित अध्यक्ष, जिला पंचायत की चार सीटो पर हुए चुनाव में एक भी कांग्रेस समर्थित प्रत्याषी का विजय न होना, जिला पंचायत अध्यक्ष उपाध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस की हार बैकुंठपुर नगरपालिका अध्यक्ष के चुनाव मंे कांग्रेस की हार चरचा नगरपालिका उपाध्यक्ष मे भाजपा का कब्जा और इसके बाद अब जिला पंचायत के उपचुनाव में भी कांग्रेस की बुरी तरह पराजय हुई है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 में बैकुंठपुर नगरपालिका का चुनाव संपन्न हुआ था उसमें भी भले ही कांग्रेस समर्थित अनेक पार्षद प्रत्याषियों ने अपने बलबूते जीत हासिल की थी, वहीं महलपारा और जूनापारा ऐसे वार्ड हैं जहां पर कि स्वयं संसदीय सचिव का निवास है और यहां पर तीन पार्षद चुने गए हैं महलपारा जो कि कांग्रेस का गढ माना जाता था यहां भाजपा पार्षद की जीत हुई है इसी प्रकार जूनापारा के एक वार्ड में भाजपा पार्षद और एक वार्ड में निर्दलीय पार्षद की जीत हुई थी। सबसे हाई प्रोफाईल वार्ड क्रामंक 1 में भी अंबिका सिंहदेव के खास समर्थक रहे आषीष डबरे ने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा था यहां से अंबिका सिंहदेव की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी उन्होने सत्ता के दुरूपयोग के साथ ही चुनाव में पूरा दमखम लगाया था लेकिन चुनाव में कांग्रेस प्रत्याषी को हार का मुंह देखना पड़ा था। कुल मिलाकर बैकुंठपुर विधानसभा मे कांग्रेस की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
क्या राजनीति में फेल हुई संसदीय सचिव?
स्थानीय विधायक और संसदीय सचिव अंबिका सिंहदेव जो कि पूर्व में राजनीति से एकदम दूर रहीं, पूर्व वित्तमंत्री स्व. डॉ.रामचंद्र सिंहदेव की इच्छा के विरूद्व वे चुनावी मैदान में उतरी थी,भाजपा के खिलाफ बने माहौल ने उन्हे अप्रत्याषित जीत दिलाई। जनता के सामने उन्होने काका स्व. डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सपनो को पूरा करने का कसम खाया जनता ने भी उन्हे समर्थन देकर अपना प्रतिनिधि चुना था। लेकिन विधायक बनते ही क्षेत्रवासियों को जो अपना रूप दिखलाया वह किसी से छिपा नही है। भाजपाई क्या सबसे पहले उन्होने वरिष्ठ कांग्रेसियों सके लेकर कनिष्ठ सभी को किनारे करना शुरू किया। ऐसे लोगो को आश्रय दिया जो कि कुमार साहब के समय पैलेस की सीढी तक नही चढ पाते थे। वास्तविक और जनता के बीच पकड़ रखने वाले कांग्रेसियों को किनारे कर नए लोगो को सर पर बैठाया। इन चार वर्षो में ऐसे लोगो ने जमकर लूट मचाई हर वर्ग को परेशान किया। कर्मचारी से लेकर सरपंच सचिव प्रताड़ित किये गए। आमजन विधायक से मिलने को तरसने लगे। देखते ही देखते संसदीय सचिव के प्रति गहरी नाराजगी देखने को मिलने लगी इसी का हश्र इस चुनाव में देखने को मिला। कांग्रेस प्रत्याषी की सिर्फ हार नही हुई बल्कि बुरी तरह से हार हुई और दूसरे क्या तीसरे स्थान पर पहुंच गया। इस हार के बाद संसदीय सचिव की जमकर किरकिरी हो रही है तो वहीं अब उनके नेतृत्व पर पर सवालिया निषान लग गया है। कुल मिलाकर कहा जाए कि वह राजनीति के क्षेत्र में फेल हो गई हैं तो कोई अतिष्योक्ति नही होगी।
आखिर क्यों हुई कांग्रेस प्रत्याशी की हार?
जिला पंचायत सदस्य हेतु कांग्रेस ने संजय टोप्पो को अपना उम्मीदवार बनाया था। खुद के बलबूते उन्होने 4 हजार से अधिक मत तो पा लिया लेकिन तीसरे स्थान पर रहने के कारण अब आगामी विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस के लिए राह आसान नही है यह कहा जाने लगा है। इस चुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा था जिसमें भाजपा प्रत्याषी ने न सिर्फ जीत हासिल किया है बल्कि प्रचंड मतो से जीत कर कांग्रेस के मुंह पर तमाचा लगा दिया है कांग्रेस के रणनीतिकार इसे सहानुभूति जीत कहकर भले ही संतोष कर ले रहे हैं लेकिन चुनाव परिणाम ने जनता के मूड को स्पष्ट कर दिया है। संसदीय सचिव के प्रति गहरी नाराजगी के कारण ही कांग्रेस प्रत्याशी की हार हुई है यह एकदम सत्य है। आमजन आज संसदीय सचिव से एकदम दूर है,उनके प्रति आका्रेषित है और जिला विभाजन के दंष को नही भूल सके हैं। परिणाम कांग्रेस के लिए निराषाजनक तो था ही लेकिन प्रदेश में सत्ता के बावजूद तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगी यह कांग्रेस के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है। बतलाया जाता है कि चुनाव पूर्व ही संसदीय सचिव से नाराजगी के कारण कई बड़े चेहरो ने चुनाव लड़ने से भी साफ इंकार कर दिया था,लोगो को उनके नेतृत्व में चुनाव कतई रास नही आ रहा था। सबसे दिलचस्प पहलू यह भी था कि इस चुनाव में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी कभी प्रचार अभियान में दिखलाई नही दिये तो वहीं वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी दूरी पर रहे। प्रत्याषी संसदीय सचिव अंबिका सिंहदेव की पसंद पर तय किय गया था, पूरी रणनीति उन्होने अपने खास सिपहसलारो के साथ मिलकर बनाया था,और परिणाम सबके सामने है।
सरपंच सचिव ने भी नही दिया साथ
कांग्रेस के इन चार वर्ष के कार्यकाल में लगभग हर वर्ग प्रताड़ित रहा, सरपंच सचिवो को भी खुब परेषान किया गया है। एक तो विकास कार्य नही और जो विकास कार्य भी हुआ उसमें जमकर बंदरबाट किया गया। सरपंच सचिव पूरे समय तनावग्रस्त थे। पंचायतो में निर्माण कार्या के लिए दबाव डालकर कांग्रेसियों ने मटेरियल सप्लाई से लेकर खुद ठेकेदारी का काम किया। पैलेस से संसदीय सचिव के खास सिपहसलारो ने सरपंच सचिवों को प्रताड़ित करने में कोई कमी नही किया,परिणाम स्वरूप इस चुनाव में सरपंच सचिव ने कांग्रेस प्रत्याशी का साथ नही दिया।
क्या अलग-थलग पड़ी संसदीय सचिव?
क्षेत्रीय विधायक ने अपने चार वर्ष के कार्यकाल में बड़े कांग्रेसी नेताओ के साथ ही कार्यकर्ताओ को भी नीचा दिखाने में कोई कमी नही किया है यह सर्वविदित है। कई बार सार्वजनिक स्थलो पर भी बहस बाजी की घटना हो चुकी है। संसदीय सचिव ने अपने कार्यकाल में हर छोटी बातो पर भयंकर हस्तक्षेप भी किया। भाजपाई क्या कांग्रेसी भी उनकी प्रताड़ना से काफी नाराज है,आज की स्थिति में उनके कई सिपहसलार काफी दूर है। हालात यह हो चुका है कि अब कई कांग्रेसी भी खुलकर आगामी चुनाव में उनकी हार की बात कहते फिरते हैं। बैकुंठपुर शहरी क्षेत्र भी संसदीय सचिव से खासा नाराज है। एक विधायक से जनता की इतनी दूरी होगी यह क्षेत्रीय जनता ने आज तक नही देखा। पूर्व वित्तमंत्री स्व. डॉ.रामचंद्र सिंहदेव व पूर्व मंत्री भैयालाल राजवाड़े जो कि आम जन से ही घिरे रहते थे पूरा समय जनता को देते थे लेकिन वर्तमान विधायक के कार्यकाल में स्थिति एकदम बदल गई है। जनता क्या कार्यकर्ता व नेता भी उनसे दूर हो चुके हैं। कांग्रेस संगठन के नेता किसी कार्यक्रम में नाममात्र के लिए कोरम पूरा करने के लिए उनके साथ जरूर खड़े दिखलाई दे रहे हैं,लेकिन हकीकत यह है कि अब संसदीय सचिव एकदम अलग-थलग पड़ गई हैं। न तो उनके पास जनता है और न ही कार्यकर्ता आमजन तो बहुत पहले से उनसे दूर है।
अधिकांश कांग्रेसी चेहरे में खुशी की लहर
यह एकदम हकीकत है कि जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार से जितनी खुशी भाजपाईयों को नही हुई उतनी खुषी कांग्रेसियों में ही देखने को मिली। कई कांग्रेसी जो कि इन दिनों संसदीय सचिव के विरोधी खेमे के माने जाते हैं उन्होने पूरे चुनाव से खुद को दूर कर रखा था, और सभी खुलकर भाजपा प्रत्याषी वंदना राजवाड़े की जीत के दावे खुद कर रहे थे। हुआ भी यही उम्मीद के मुताबिक परिणाम आया और संसदीय सचिव के विरोधी खेमे में जबरजस्त खुशी देखने को मिली। जिला पंचायत चुनाव का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव में पड़ेगा इस बात से इंकार नही किया जा सकता।
सलाहकारो ने डुबाई लुटिया
संसदीय सचिव अंबिका सिंहदेव जिनका राजनीति से दूर-दूर तक वास्ता नही था, अचानक उन्होने राजनीति के मैदान में प्रवेष किया, स्व.काका साहब के सपनो को पूरा करने का जनता को आश्वसन दिया, जनता ने भी एक मौका उन्हे दिया लेकिन वे न तो काका का सपना पूरा कर सकी और न ही आम जन के लिए काका की तरह उपलब्ध हो सकीं। आज जनता से दूरी इतनी हो चुकी है कि अब वह दूरी खत्म नही की जा सकती, और काका के सपनो को पूरा करना तो दूर की बात उनके सपनो का कोरिया विखंडित हो गया। यह बात स्थानीय जनो को नागवार गुजरा है। इस बारे में लोगो का कहना है कि संसदीय सचिव ने विधायक बनते ही ऐसे लोगो को अपने करीब रखा जो कि एकदम अपरिपक्व थे,राजनीति के साथ ही प्रशासनिक क्षेत्र का उन्हे अनुभव नही था। एक विवादित पत्रकार को अपना निज सहायक बनाया और पत्रकार ने संसदीय सचिव के आंख में धूल झोकने का भरपूर काम किया। अपने मित्र मंडली के साथ मिलकर उक्त पत्रकार ने संसदीय सचिव को दिग्भ्रमित कर उनकी राजनीति को गर्त में डाल दिया। ऐसा-ऐसा सलाह दिया कि उससे संसदीय सचिव की सिर्फ किरकिरी हुई है। उक्त पत्रकार ने मित्र मंडली के साथ मिलकर खुद के स्वार्थ में राजनीतिक पकड़ रखने वाले लोगो को भी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहा जाता है कि राजनीतिक व्यक्ति के पास सलाहकार यदि ठीक हो तो उसे शिखर पर पहुंचा देता है यदि सलाहकार अपरिपक्व, स्वार्थी, विवादित और दिशाहीन व्यक्ति हो तो राजनीतिक व्यक्ति की राजनीति गर्त में चली जाती है इसका उदाहरण बैकुंठपुर क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। संसदीय सचिव को सलाहकारो ने पूरे चार वर्ष में क्या सलाह दिया वह उनकी वर्तमान स्थिति देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा रहा है। बहरहाल सलाहकार अब आने वाले समय में संसदीय सचिव को क्या रास्ता दिखाते हैं वह भविष्य में देखने को मिलेगा। लेकिन संसदीय सचिव की लुटिया डुबोने में वर्तमान सलाहकार व मित्र मंडली की मुख्य भुमिका है इससे इंकार नही किया जा सकता।