बैकुण्ठपुर@ क्या केवल पैसा होना ही सामाजिक स्वीकार्यता की सबसे बड़ी जरूरत है?

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  • क्या राजनीति में भी पैसे के दम पर बड़े पदों पर पहुंचा जा सकता है?
  • क्या पैसा होना ही सभी आरोपों से बरी करने करने के लिए काफी होता है?
  • आज के परिवेश में पैसे के दम पर सामाजिक बनकर राजनीति में प्रवेश हुआ आसान
  • भले ही पहले लगे हों क्यों न गंभीर से गंभीर आरोप,पैसा है तो आरोपों को भी दरकिनार कर जाते हैं लोग
  • क्या पैसे के दम पर समाजिक स्वीकार्यता पाई जा सकती है?
  • पैसे से पुराने आरोप मिट जाएंगे और सामाजिक स्वीकार्यता मिल जाएगी?
  • क्या सामाजिक स्वीकार्यता जरूरी है या फिर पाने की ढोंग?
  • रवि सिंह-
    बैकुण्ठपुर 27 दिसम्बर 2022 (घटती-घटना)। इस समय राजनीति में एक कहावत बहुत सटीक बैठती है कहावत काफी पुरानी है और इस कहावत से सभी वाकिब है यह कहावत है सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को, इस मुहावरे का कई असल जि़न्दगी से उदाहरण दे सकते हैं, सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली मुहावरे का मतलब है- कोई व्यक्ति बहुत से पाप करने के बाद अचानक भलाई करने लगता है। साधारण तौर पर इस मुहावरे को पापी लोगों का मज़ाक उड़ाने के लिए बोला जाता है। लेकिन सकारात्मक बदलाव में विश्वास रखे तो जब जागो तब सवेरा। अतः अगर कोई व्यक्ति बूरे रास्ते को छोड़कर अच्छा काम करना चाहे तो उसे वह करने देना चाहिए। लेकिन हमें सतर्क रहना होगा कि वह केवल दिखावा तो नहीं कर रहा। कुछ राजनीति में प्रवेश स्वच्छ छवि वाले को कम ही मिलती है राजनीति में प्रवेश वही करते हैं जो अपने ऊपर लगे आरोप व दागों को पैसे कमाने के बाद पैसे के दम पर सामाजिक सुखकर्ता पाकर पाक साफ बताने में जुट जाते हैं, राजनीति में आने के लिए अपने आप को समाजसेवी बताने लगते हैं पर यह भूल जाते हैं कि इनकी समाज सेवा तो पहले से ही नहीं थी सिर्फ थी तो लूट खसोट के साथ गलत तरीके से पैसे कमाना, अब जब पैसे कमा लिए हैं तो उस पैसे से जो समाज स्वीकार नहीं करता था अब उससे स्वीकार्यता चाहते हैं, स्वीकार्यता सिर्फ इसलिए चाहिए ताकि इनका जनाधार बढ़ सके और इन्हें राजनीति में अच्छी मुकाम हासिल हो सके पर पीछे किए हुए गलतियों का क्या?
    मेहनत करने वाला राजनीतिक दल का सच्चा सिपाही यदि पैसे से कमजोर है तो वह राजनीति में पिछड़ा ही नजर आता है
    आज के परिवेश में खासकर राजनीतिक क्षेत्र में यह अमूमन देखा जा रहा है कि पैसे के दमपर ही राजनीति में सफलता मिल पा रही है। मेहनत करने वाला राजनीतिक दल का सच्चा सिपाही यदि पैसे से कमजोर है तो वह राजनीति में पिछड़ा ही नजर आता है जबकि यदि पैसा है और भले ही आरोपों की लंबी फेहरिस्त किसी के साथ चल रही हो वह राजनीतिक में आगे निकल जाता है सफलता के शीर्ष तक पहुंच जाता है। राजनीति में प्रवेश का जो नया तरीका आजकल सामने आया है जिसे पैसे वाले लगातार अपनाते हुए नजर आ रहें हैं उसमें देखा जा रहा कि पैसे वाले राजनीति में प्रवेश के लिए सबसे पहले सामाजिक होने का ढोंग करते हैं उसके बाद वह सामाजिकता के रास्ते राजनीति में कब प्रवेश कर जाते हैं इसका किसी को पता ही नहीं चलता और पता तब चल पाता है जब वह राजनीति में सफलता प्राप्त करते हुए धनार्जन करने में रत हो जाते हैं सामाजिकता को भूल जाते हैं और समाज को ही लूटने का काम करने लगते हैं।राजनीति में भी ऐसे लोगों की पूछ परख ज्यादा ही है क्योंकि अर्थ आवश्यक्ता की वजह से राजनीतिक दल भी ऐसे लोगों को प्रथम पंक्ति दिलाने से पीछे नहीं हटते क्योंकि उन्हें अर्थ की जरूरत होती है और अर्थ के साथ वह राजनीति में अपना और अपने दल का भी हित साधते हैं।
    समाज सेवा का मुखौटा पहनकर जिसने समाज की उन्नति कैसे?
    आज प्रायः देखा जा रहा है कि ऐसे लोगों का राजनीति में ज्यादा प्रवेश हो रहा है जो समाज को लूटते चले आ रहे हैं और एकाएक उनके व्यवहार में बदलाव आया है और वह सामाजिक हो गए हैं। ऐसे लोग सामाजिक होकर फिलहाल समाज सेवा कर रहें हैं लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य है राजनीति में प्रवेश करना और वह उसमें सफल होते ही समाज सेवा छोड़ देंगे यह भी तय है। समाज भी ऐसे लोगों को जल्द स्वीकार कर लेता है और अपनी गलती पर उसे तब पछतावा होता है जब उसे भविष्य में पता चलता है कि समाज सेवा का मुखौटा पहनकर जिसने समाज की उन्नति का सजबाग दिखाया था वह असल मे अपनी ही सफलता के लिए प्रयासरत था और वह राजनीतिक सफलता के उद्देश्य से समाजसेवा का नाटक कर रहा था जो बाद में समझ मे आया।
    नया समाजसेवी धड़ा राजनीति में प्रवेश कर रहा है
    समाज मे पहले राजनीति करने वालों का एक अलग समुदाय हुआ करता था और राजनीति करने वाले भी राजनीतिक सुचिता साथ ही सामाजिक उत्थान के लिए सोचा करते थे लेकिन अब जो नया समाजसेवी धड़ा राजनीति में प्रवेश कर रहा है उसे समाजसेवा से कोई लेना देना नहीं है उसे अपने उत्थान मात्र से मतलब है यही सत्य है क्योंकि जब उसे समाजसेवा का मौका मिला तब उसने समाज को जमकर लुटा और जब उसने समाज सेवा का दिखावा किया तब उसने हिसाब भी बनाया की उसने समाज पर क्या कितना खर्च किया है जिसे वह राजनीति में प्रवेश के बाद समाज से ही उसके हक¸ से छीनकर वापस लेगा।
    राजनीति में मेहनत कम नाम और दाम ज्यादा?
    समाजसेवा बनकर राजनीति में प्रवेश करने वालों में से अधिकांश को यदि देखा जाए तो यह पाया जाएगा कि वह वर्तमान में भी ऐसी जिम्मेदारियों से जुड़े हुए हैं कि यदि वह चाह लें तो उन्हें राजनीति में प्रवेश की आवश्यकता नहीं होगी और वह बिना राजनीति प्रवेश के ही समाजसेवा कर सकते हैं और वह सक्षम भी हैं लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहें हैं वर्तमान में मिली समाजसेवा की जिम्मेदारी से वह चोरी कर रहें हैं समाज को लूटने का काम कर रहें हैं, डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस सहित कई बड़े पदों पर बैठे लोग जो चाह भर लें तो समाज को नई दिशा दे सकते हैं समाज को सहारा दे सकते हैं वह राजनीति में प्रवेश कर रहें हैं और वह राजनीति में क्यों प्रवेश कर रहें हैं यह समझा जा सकता है। राजनीति में मेहनत कम नाम और दाम ज्यादा है यह भी कहना गलत नहीं है और यही वजह है कि राजनीति की तरफ अब वह वर्ग भी सामने आ रहा है जिसे समाज मे अलग ही कार्य के लिए जिम्मेदारी मिली हुई है।
    लूट खसोट के लिए कुछ लोगों को राजनीति में प्रवेश की इच्छा होती है?
    यह सभी कुछ एक निवेश की तरह है यह समझा जा सकता है जब लूट खसोट कर अर्थ की आवक पर्याप्त हो जाती है कुछ लोगों को राजनीति में प्रवेश की इक्षा होती है और वह राजनीतिक गलियारों की तरफ रुख करते हैं और अपने लिए उपयुक्त राजनीतिक दल का चयन करते हैं उसके बाद वह सामाजिक होने का भरपूर ढोंग करते हैं और जब समाज उनको धीरे धीरे स्वीकार करने लगता है वह राजनीति में लंबी छलांग की तैयारी कर छलांग लगा जाते हैं और यह छलांग उनके लिए फायदेमंद सौदे की तरह साबित होता है और समाज के लिए नुकसान का सौदा क्योंकि समाज ऐसे व्यक्ति को शीर्ष तक पहुंचा चुका होता है जो समाज हित की सोच रखता तो शायद पहले की जिम्मेदारियों में ही वह समाजसेवा करता उसे राजनीतिक भूमिका की जरूरत कभी नहीं पड़ती। राजनीति में जहां अर्थ के लिए समाजसेवा के नाम पर लोग प्रवेश कर रहें हैं वहीं उनका मुख्य लक्ष्य सोहरत एवम नाम भी होता है जिसकी उन्हें तलब होती है और यही तलब है जो राजनीति की तरफ ऐसे लोगों को आकर्षित करती है।

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