- रसूखदारों की दबंगई ने कड़ाके की ठंड में छीन लिया एक परिवार का आशियाना
- न्यायालय के आदेश को दरकिनार कर ग्रामीणों ने आदिवासी के घर बोला धावा
- चंद घंटों में पूरे मकान को किया ध्वस्त, घरवाले स्थगन आदेश का देते रह गए हवाला
- महिलाओं के साथ खुलेआम होती रही गुंडागर्दी, सरेराह उन्हें पीटा गया, आई गंभीर चोटें
- एफआईआर के बजाए मामले को दबाने में लगा रहा पुलिस प्रशासन, दबाव के कारण अंततः एफआईआर हुआ दर्ज
- सरेराह होती रही मारपीट, लोग देखते रहे तमाशा और बनाते रहे वीडियो
- एसडीएम के आदेश को किया दरकिनार, तहसीलदार के आदेश पर ग्रामीणों ने की गैर कानूनी कार्यवाही
–रवि सिंह –
बैकुंठपुर 06 दिसम्बर 2022 (घटती-घटना)। पोड़ी बचरा तहसील अंतर्गत ग्राम जिल्दा के एक आदिवासी के घर को ग्रामीणों द्वारा तोड़ने का मामला प्रकाश में आया है। जहां तहसीलदार ने उक्त आदिवासी के घर को तोड़ने दिया था आदेश।तहसीलदार के आदेश को लेकर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व बैकुंठपुर को किया गया था अपील। अपील उपरांत अनुविभागीय अधिकारी ने प्रकरण में दिया था स्थगन का आदेश। यह माना जारहा है की एक हतप्रभ कर देने वाली घटना सामने आई है कुछ दबंगों की दबंगई ने यहां एक परिवार का आशियाना ही छीन लिया। सैकड़ो की भीड़ के बीच ये दबंग बेख़ौफ़ होकर वर्षों से बने घर को ढहा ये साबित कर दिया कि यहां कानून नाम की कोई चीज ही नही है। मामला खड़गवां विकासखंड पोडी¸ बचरा तहसील अंतर्गत ग्राम जिल्दा के एक आदिवासी का मकान कथित तौर पर शासकीय जमीन पर बना हुआ है। जिसे हटाने का आदेश तहसीलदार न्यायालय द्वारा दिया गया था। जिसके विरुद्ध एसडीएम न्यायालय बैकुंठपुर से स्थगन आदेश प्राप्त था, जिसकी प्रति तहसीलदार न्यायालय एवं संबंधित थाने को प्रेषित की जा चुकी थी। बावजूद इसके तहसीलदार न्यायालय के आदेश को सर्वमान्य मानकर ग्रामीणों ने आदिवासी के मकान पर धावा बोल दिया। जो व्यक्ति और महिलाएं घर पर मौजूद थे, उनके साथ सरेराह ग्रामीणों द्वारा गुंडागर्दी करते हुए जमकर मारपीट की गई। उन्हें गंभीर चोटें पहुंचाई गई और कुछ ही घंटों में आदिवासी व्यक्ति के पूरे मकान को नेस्तनाबूद कर दिया गया। भीड़ में मौजूद लोग इतने आक्रोशित थै की महिलाओं को सड़क पर लाकर पीटा गया, जिन्हें गंभीर चोटें आई। महिलाएं चिल्लाती रही, परंतु उनकी मदद के लिए कोई सामने नहीं आया। अपितू लोग फोटो खींचने और वीडियो बनाने में मशगूल रहे।
जानकारी अनुसार बीते दिवस जिल्दा में रहने वाले नवल साय शासकीय भूमि पर करीब 15 साल पुराने बने मकान में परिवार समेत रहते है। घटना 5 दिसंबर दोपहर 3 बजे की है,जब नवल साय का परिवार घर मे मौजूद थे तभी गांव के कुछ लोग गाली गलौज कर जान से मारने की धमकी देते हुए घर के अंदर घुसकर मारपीट करते हुए घर को तोड़ दिया ।घटना के बाद पीडि़त पक्ष ने थाने पहुंच मामले में नामजद एफआईआर दर्ज कराई जिसमे पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धारा 147, 294, 323, 427, 452, 506 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लेकर 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के आदेश के विपरीत किये कृत्य के खिलाफ पीडि़त ने थाने में दर्ज करारी रिपोर्ट
वाबजूद ग्राम जिल्दा के कुछ ग्रामीणों द्वारा तहसीलदार के आदेश को सर्वमान्य मानकर नियमविरुद्ध तरीके से बड़ी संख्या में धावा बोल घर को किया गया क्षतिग्रस्त। जबकि पीडि़त द्वारा तहसीलदार के आदेश के खिलाफ अनुविभागीय अधिकारी के स्थगन आदेश की प्रति तहसीलदार समेत थाना में पीडि़त ने दिया था सूचना। सूत्रों के अनुसार तथाकथित भीड़ के द्वारा अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के आदेश के विपरीत किये कृत्य के खिलाफ पीडि़त ने थाने में पहुँच लिखवानी चाही रिपोर्ट, तब पीडि़त के ऊपर मामले को दबाने बनाया गया दवाब, अंततः हुआ एफआईआर दर्ज।
यह है मामला
जानकारी के अनुसार तहसील पोड़ी के प्रकरण क्रमांक 202111012600008/22/बी-121/2021-22 में दर्ज है। ग्रामीण सागर सिंह व अन्य 29 ग्राम जिल्दा व नवल साय जिल्दा निवासी के बीच मामला चल रहा है। मामले की सुनवाई कर तहसीलदार ने 25 दिसंबर को नवल साय को नोटिस जारी कर खसरा नंबर 285 रकबा 0.66 हेक्टेयर में से 9 मीटर चौड़ाई और 19 मीटर लंबाई, जो बड़े झाड़ के जंगल मद में मकान बनाने को लेकर एक हजार रुपए जुर्माना लगाया गया है। वहीं बेदखल करने आदेश पारित हुआ है। मामले में 5 दिसंबर के पहले अतिक्रमण हटाने और जुर्माना राशि जमा करने नोटिस जारी हुआ था। मामले में ग्रामीण नवल सिंह ने एसडीएम बैकुंठपुर न्यायालय में अधिवक्ता के माध्यम से अपील लगाई थी। जिसकी सुनवाई कर तहसील से पारित बेदखली कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी। वहीं दूसरे पक्ष के ग्रामीणों ने अनुविभागीय अधिकारी के स्थगन आदेश को न मानते हुए और बिना किसी प्रशासनिक अधिकारी के मौजूदगी के ही बलपूर्वक नवल साय के परिवार के साथ मारपीट करते हुए घर को ढहा दिया।
पुलिस प्रशासन मामले को दबाने में रहा लगा रहा
सूत्रों की माने तो मामला यहीं नहीं रुका, इतने भीषण ठंड में आदिवासी परिवार के पूरे आशियाने को तोड़ने और महिलाओं के साथ मारपीट करने की रिपोर्ट जब संबंधित चौकी में की जानी चाहि तो पुलिस प्रशासन मामले को दबाने में रहा लगा रहा। अंततः मजबूर होकर पुलिस प्रशासन को एफ आई आर दर्ज करनी पड़ी। पूरे मामले में बड़ा सवाल यह है की स्थगन आदेश की प्रति जब तहसील कार्यालय और संबंधित चौकी में पहुंच चुकी थी, तो इतने बड़े मामले को ग्रामीणों ने अपने हाथ में लेने का दुस्साहस कैसे किया? यदि स्थगन आदेश नहीं भी होता तो कब्जा किए गए जमीन से मकान को हटाने का कार्य प्रशासन का था। इसमें ग्रामीणों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। परंतु खुलेआम गुंडागर्दी की तर्ज पर इतनी बड़ी कार्यवाही का कर जाना किसी सरपरस्ती को संकेत करता है।
भीषण ठंड में उजड़ा आशियाना, जिम्मेदार कौन और पनाह कहां?
शासन-प्रशासन लाख कार्यवाही की बात करें, पर जिस परिवार का आशियाना इस भीषण ठंड में उजड़ गया है उसे तत्कालीन राहत कैसे मिलेगी?? यह एक बड़ा प्रश्न है। मामले को करीब से जानने वालों का यह भी कहना है की ग्रामीणों द्वारा जब धावा बोला गया? तो मकान पर निवासरत महिलाओं को मारपीट करते हुए बाहर ले जाया गया और मकान के अंदर मौजूद सामग्री को भी तहस-नहस कर दिया गया है। एवं उन सामग्रियों, सामानों के ऊपर ही मकान को गिरा दिया गया, जिससे मकान के भीतर मौजूद सारी वस्तुएं क्षतिग्रस्त हो गई। अब इसकी भरपाई कौन करेगा? इतनी भीषण ठंड में आदिवासी परिवार के सदस्य जाएंगे कहां और दैनिक जीवन कि आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति कहां से होगी इसका जवाब भी प्रशासन को देना चाहिए। पूरे मामले में आश्चर्य का विषय यह भी है की असंत ग्रामीण घंटों मकान को छतिग्रस्त करते रहे परंतु चंद किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पुलिस प्रशासन ने उक्त कार्यवाही को रोकने किसी प्रकार की कोई पहल नहीं की।