नई दिल्ली, 13 सितम्बर 2022। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतत्रता राष्ट्रीय अदालतो द्वारा बताई जाने वाली सबसे पुरानी अवधारणाओ मे से एक है, और किशोरो को वयस्क जेलो मे बद करना कई पहलुओ पर उनकी व्यक्तिगत स्वतत्रता से वचित करना है। न्यायमूर्ति सूर्यकात और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतत्रता की अवधारणा को कही अधिक व्यापक व्याख्या मिली है और आज स्वीकार की गई धारणा यह है कि स्वतत्रता मे वे अधिकार और विशेषाधिकार शामिल है, जिन्हे लबे समय से एक स्वतत्र व्यक्ति द्वारा खुशी की व्यवस्थित खोज के लिए आवश्यक माना जाता है।
पीठ ने एक फैसले मे कहा, यह कहने मे कोई गुरेज नही है कि किशोरो को वयस्क जेलो मे बद करना कई पहलुओ पर उनकी व्यक्तिगत स्वतत्रता से वचित करना है। पीठ ने कहा कि किशोर न्याय प्रणाली के पदाधिकारियो मे बच्चे के अधिकारो और सबधित कर्तव्यो के बारे मे जागरूकता कम है। उन्होने इस बात पर जोर दिया कि एक बार बच्चा वयस्क आपराधिक न्याय प्रणाली के जाल मे फस जाता है, तो बच्चे के लिए इससे बाहर निकलना मुश्किल होता है।
शीर्ष अदालत ने एक हत्या के दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणिया की, जिसने उम्रकैद की सजा काट रहे अपराध के समय नाबालिग होने का दावा किया था। याचिकाकर्ता, जिसकी सजा को 2016 मे शीर्ष अदालत ने बरकरार रखा, उसने कोर्ट से उार प्रदेश सरकार को उसकी सही उम्र के सत्यापन के लिए निर्देश देने की माग की।
याचिकाकर्ता विनोद कटारा की ओर से पेश अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने कहा कि उनके मुवक्किल ने किशोर होने की दलील नही दी थी, फिर भी कानून उन्हे किशोर न्याय (बच्चो की देखभाल और सरक्षण) सशोधन अधिनियम, 2011 के प्रावधानो के सबध मे इस समय भी इस तरह की याचिका दायर करने की अनुमति दे रहा है। याचिकाकर्ता को परिवार रजिस्टर प्रमाण पत्र भी प्राप्त हुआ, जहा उसका जन्म वर्ष 1968 दिखाया गया था, और दावा किया कि अपराध के समय वह 14 वर्ष का था।
पीठ ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ समय बाद, रिट आवेदक यूपी पचायत राज (परिवार रजिस्टरो का रखरखाव) नियम, 1970 के तहत जारी परिवार रजिस्टर दिनाक 02.03.2021 के रूप मे एक दस्तावेज प्राप्त करने की स्थिति मे था। फैमिली रजिस्टर सर्टिफिकेट, रिट आवेदक का जन्म वर्ष 1968 के रूप मे दिखाया गया है। कोर्ट ने कहा कि यह रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजी सबूत है जो कानून के सघर्ष मे एक किशोर की उम्र निर्धारित करने मे एक प्रमुख भूमिका निभाते है।
शीर्ष अदालत ने चिकित्सा आयु निर्धारण परीक्षण का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का परीक्षण तीन डॉक्टरो की एक टीम द्वारा किया जाएगा, जिनमे से एक डॉक्टर को रेडियोलॉजी विभाग का प्रमुख होना जरुरी है। आगे कहा गया, हम आगरा के सत्र न्यायालय को इस आदेश के सचार की तारीख से एक महीने के भीतर कानून के सबध मे रिट आवेदक के किशोर होने के दावे की जाच करने का निर्देश देते है।शीर्ष अदालत ने सत्र अदालत को याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत परिवार रजिस्टर को सत्यापित करने का निर्देश दिया।
