कोरिया कुमार और थाती के घाती!

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स्व. रामचन्द्र सिंहदेव! ये आधिकारिक नाम कोरिया की पहचान समझा जाता है मगर सादगी और सरलता का पर्याय समझे जाने वाले इस हुतात्मा के कोरिया के प्रति समर्पण और निष्ठा ने कोरिया के जन जन को ऐसे प्रेम और अपनत्व में बांधा है कि उन्हें उनके सामंती नाम “कोरिया कुमार” से पुकारने में न कभी किसी तरह की राजशाही दासता झलकी और न “हुजूर सरकार” के सम्बोधन में हीनता महसूस हुई! “कोरिया कुमार” नाम में कोरिया प्रेम और लगाव इतने गहरे समाया रहता है कि उन्हें उनके आधिकारिक नाम डॉक्टर रामचंद्र सिंहदेव से पुकारना न केवल असहज लगता है बल्कि कोरिया की उनकी अपनत्व भरी थाती को अपमानित करने जैसा भी है।
कोरिया कुमार के चुनावी राजनीति से विदा होने के बाद के दस साल तक कोरिया कुमार की राजनैतिक विरासत की दावेदारी के मामले में राजपरिवार की तरफ से कोई हलचल नहीं दिखी और कोरिया कुमार ने भी अपनी चुनावी राजनीति के किसी उत्तराधिकारी का एलान नहीं किया था! नतीजन लगातार दो चुनाव में कोरिया कुमार के विरासती विकल्प की कोई सुगबुहाट भी नही  थी और कोरिया कुमार के आखरी चुनाव के बाद दो बार उनके ही एक समर्थक स्थानीय क्षत्रप की बलि चढाई गयी! मगर 2018 में परिस्थितियां का बदला हुआ रुख दिखा तो लगभग आठ सौ वोट के अल्प अंतर से पिछले चुनाव में खेत रहे उस स्थानीय क्षत्रप की सम्भावित विधायकी पर कब्जा जमाने चुनावी विरासत के दावेदार को तेल की धार नाप कर ग्रेट ब्रिटेन से व्हाया कलकत्ता इम्पोर्ट किया गया और फिर उसके तुरन्त बाद कोरिया कुमार के सपनों के “खेला” का तंबू पूरे विधानसभा क्षेत्र में गढ़ना शुरू हुआ था! कोरिया कुमार की राजनैतिक विरासत के इम्पोर्टेड दावेदार का आगमन, कोरिया कुमार की विरासत पर घात लगाए कब्जा ब्रिगेड के लिए खुद को राजनैतिक हाशिये से बाहर निकालने का “मौका मौका” ही था और उन्होंने भी इसे भुनाने में कोई कसर रख नहीं छोड़ी! शहर से लेकर गांव तक कोरिया कुमार के सपने पंख पसारे उड़ान भरने लगे! हर बारिश के बाद पैलेस की सीलन भरी देहरी में फफूंदें उठ आती होंगी मगर इस बार फफूंदों की जगह खरपतवारी युवा नेता उग आए और कोरिया कुमार के सपनों का रिटेल काउंटर इनके ही हवाले किये! कब्जाई गयी आयातित विरासत की पालकी उठाने कुछ पुराने हरकारे भी दौड़े थे मगर वो चुनावी मंच में सजावट के सामान से ज्यादा कुछ हो भी नहीं सकते थे! चुनावी सभाओं में कोरिया कुमार के सपने सादगी और सरलता की चाशनी में डूबे रहे और 11 दिसम्बर 2018 को बैकुंठपुर विधानसभा ने कोरिया के बकिंघम पैलेस में कथित विरासत की ताजपोशी कर ही दी थी और बैकुंठपुर लन्दन बनने  के सफर में निकल गया था! समय बीतते ओढ़ी हुई सादगी की परतें उधड़ने लगी, सरलता का तिलस्म टूटने लगा और 2022 आते तक तो विरासत के इस “खेला” कल्चर ने न केवल संगठन को लील लिया बल्कि स्थानीय दिग्गजों को फांस के इस लायक भी नहीं छोड़ा कि वो कानाफूसी से ज्यादा कुछ भी कर सके!
राजनीति में सपने बेचने का कारोबार नया नहीं है मगर यहां सपने सिर्फ बेंचे नहीं जाते है और न सिर्फ उनकी ब्रांडिंग और पैकेजिंग की जाती है बल्कि इन सपनों के ब्रांड एम्बेसडर का नाम  “जब तक सूरज चांद रहेगा” कि अगली लाइन जोड़ कर  उन सपनों की मार्केटिंग भी की जाती है! एक निर्मल और पवित्र पुण्यात्मा जिसने कभी भी अपनी राजनैतिक विरासत किसी के नाम की भी न हो उसके राजनैतिक उत्तराधिकारी के तौर पर सपनों के किसी आयातित कब्जाधारी कारोबारी का नाम लिया जाये तो न केवल उस पवित्र विरासत के साथ छल होता है बल्कि उसका महान आत्मा का अपमान भी होता है! याद रखियेगा इस यक्ष प्रश्न से आज नहीं कल हर किसी का सामना होना है कि इस चुनावी विरासत ने सपने बेचने के अलावा कोरिया को दिया क्या है?
कोरिया कुमार के कद, व्यक्तित्व और कार्यशैली के कौन से मानक टूटने से बचे है! वो नेता नहीं लीडर थे, उनका पास विजन था, उनके पास विज्डम था और कनविक्शन था मगर उनकी इंटलेक्चुअल थाती उन घातियो के हवाले है जो उनके सपनों का भाषण ठोकते है मगर बक्सा खोल कर देखते भी नहीं कि इन सपनों की इबारतें किन दस्तावेजों में उन्होंने लिख कर छोड़ी हुई है! कहने को बहुत कुछ है मगर इस लेखक में इतनी नैतिकता हमेशा रहेगी कि व्यक्तिगत बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाय मगर इतना इशारा करना जरूरी समझता हूं कि इस सादगी और सरलता के पीछे की हकीकत से लेखक तो बखूबी वाकिफ हो चुका है और आपको भी इससे वाकिफ कराना मेरा धर्म है! इसलिए आँखे खोलिए, देखिये, समझिए और खुद तय कीजिये! इस लेखक ने तो तय कर लिया है कि सपनों के इस सौदागर का बचा खुचा तिलस्म भी तोड़ा जायेगा, हजरत निजसमुद्दीन जाने वाली ट्रेन बैकुंठपुर से गुजरने लगी है क्या पता 2023 में बैकुंठपुर स्टापेज वाली कोई ट्रेन अम्बिकापुर से हावड़ा भी चलने लगे, बस समय का इंतजार कीजिये, आवाज तेज होगी, सुर तीखे होंगे, हां, मंच जरूर बदला हुआ होगा मगर जो भी कहा जायेगा…. सच कहा जायेगा और सिर्फ सच ही कहा जायेगा!

अंत में एक तुर्की कहावत (अंग्रेजी प्रयोग की माफी के साथ)

      “When a clown moves into a palace he does not become a king. The palace becomes a circus”!

महेंद्र दुबे

महेंद्र दुबे
अधिवक्ता उच्च न्यायालय विलासपुर
बैकुन्ठपुर कोरिया(छ.ग.)


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