20 साल में पहली बार हुआ ऐसा हाल, डॉलर मालामाल और यूरो क्यों हुआ इतना बदहाल?

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वर्ल्ड डेस्क, ब्रसेल्स 13 जुलाई 2022  विश्लेषकों के मुताबिक ऊर्जा संकट के कारण पूरे यूरोप- खास कर ईयू क्षेत्र में महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर है। उससे आर्थिक मंदी की स्थिति बन गई है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने एलान किया है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए इस महीने वह ब्याज दर बढ़ाएगा। 2011 के बाद पहली बार यूरो जोन में ऐसा कदम उठाया जाएगा…

बीस साल में ऐसा पहली बार हुआ है, जब अमेरिकी मुद्रा डॉलर और यूरोपियन यूनियन (ईयू) की मुद्रा यूरो की कीमत लगभग बराबर हो गई है। सोमवार को एक यूरो की कीमत सिर्फ 1.004 डॉलर रह गई। जब से यूरो प्रचलन में आया, वह हमेशा ही डॉलर से मजबूत मुद्रा रहा। लेकिन इस वर्ष के आरंभ से उसकी कीमत में अब तक 12 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। नतीजा है कि उसकी कीमत डॉलर के करीब पहुंच गई है।

यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद से यूरो की कीमत में तेजी से गिरावट आई है। रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण यूरोप में ईंधन का संकट पैदा हो गया है। यूरोप में गैस की जरूरत का 40 फीसदी हिस्सा रूसी आयात से पूरा होता था। लेकिन ईयू ने रूस को दंडित करने के लिए उससे तेल का आयात घटा दिया। ईयू के सबसे बड़े देश जर्मनी ने गैस आयात के लिए बनी नॉर्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन को रद्द कर दिया। उधर नॉर्ड स्ट्रीम-1 से भी गैस की सप्लाई में 60 फीसदी तक की गिरावट आ गई है।

विश्लेषकों के मुताबिक ऊर्जा संकट के कारण पूरे यूरोप- खास कर ईयू क्षेत्र में महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर है। उससे आर्थिक मंदी की स्थिति बन गई है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने एलान किया है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए इस महीने वह ब्याज दर बढ़ाएगा। 2011 के बाद पहली बार यूरो जोन में ऐसा कदम उठाया जाएगा। ब्याज दर बढ़ने से मंदी की आशंका और गंभीर हो जाएगी।

तीन दशक में पहली बार ऐसा हुआ है, जब जर्मनी को व्यापार घाटा झेलना पड़ा हो। सैक्सो बैंक के एक विदेशी मुद्रा रणनीतिकार ने हाल में अपनी एक टिप्पणी में लिखा है- ‘जर्मनी के निर्यातों की प्रकृति ऐसी है कि कॉमोडिटी की महंगाई की उन पर भारी असर होता है। इसलिए यह सोचना कठिन लगता है कि अगले कुछ महीनों में जर्मनी व्यापार संतुलन कायम कर पाएगा। इसकी एक बड़ी वजह यूरो जोन की अर्थव्यवस्था में संभावित गिरावट भी है।

अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से बातचीत में कई विश्लेषकों ने कहा कि दुनिया के कई सेंट्रल बैंकों ने ब्याज दर बढ़ाने की आक्रामक नीति अपनाई है। इनमें अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व भी है। इस मामले में ईसीबी पिछड़ गया। इस वजह से यूरो दबाव में आया है। फिलहाल बड़ी संख्या में निवेशक यूरो से धन निकाल कर उसका निवेश डॉलर में कर रहे हैं। यह यूरो की कीमत में आई अभूतपूर्व गिरावट का प्रमुख कारण है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर अमेरिका और यूरोप में सचमुच मंदी आ गई, तो डॉलर में निवेश का रुझान और तेज हो जाएगा। उससे यूरो की स्थिति और कमजोर होगी। ड्यूश बैंक के विदेशी मुद्रा संबंधी विभाग के प्रमुख जॉर्ज सारावेलोस ने पिछले हफ्ते ही चेतावनी दी थी कि यूरो की कीमत डॉलर से कम हो जाने की वास्तविक संभावना है। उन्होंने एक टिप्पणी में लिखा- एक डॉलर 0.95 से 0.97 यूरो के बराबर हो जाए, यह स्थिति जल्द ही आ सकती है। अगर इस वर्ष की तीसरी तिमाही में यूरोप और अमेरिका मंदी में चले गए और फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाता रहा, तो ऐसा होना लगभग तय हो जाएगा।


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