- सरकार के विरुद्ध धरने पर सरकार, जनता कर रही अपनी बारी का इंतजार।
- भारतीय राजनीति के व्यवसाय में निवेश के समान है (वोट डालते हुए) इससे जुड़े जोखिमों को ध्यानपूर्वक समझ लें।
- निवेश का लॉक-इन पीरियड 5 साल का है कोई जरूरी नहीं है कि राजनीतिक कंपनियां ‘रिटर्न’ के जो वादे कर रही हैं, वो सही हो।
- आपके निवेश (वोट) पर रिटर्न (आपसे किए वादों की पूर्ति) बाजार की स्थिति (तात्कालिक मुद्दों और सरकार की वित्तीय स्थिति) पर निर्भर है।
लेख रवि सिंह कटकोना कोरिया: देश चलता नहीं, मचलता है मुद्दा हल नहीं होता, सिर्फ उछलता है जंग मैदान में नहीं, सोशल मिडिया पर जारी है आज मेरी, तो कल तेरी बारी है।
विकट विडंबना है कि संघीय शासन प्रणाली में एक चुनी हुई सरकार (केंद्र सरकार) के विरुद्ध ही दूसरी चुनी हुई सरकार (राज्य सरकार) धरने पर है। हास्यास्पद यह है की इन प्रदर्शनों से जनता का कुछ भला होने वाला नहीं। जनता के मुद्दे या तो गौण हैं या पूरी तरह गायब हैं। मामला भी कोई ऐसा खास नहीं जिसके लिए एक सरकार के खिलाफ दूसरी सरकार को पूरी शक्ति के साथ धरने पर बैठना पड़े, रैलियां करनी पड़ें, शक्ति प्रदर्शन करना पड़े। एक साधारण जांच और पूछताछ के लिए जब पूरी की पूरी सत्ता, सत्ता में पदासीन शीर्ष नेतृत्व और उनके नुमाइंदे जब सड़क पर आकर प्रदर्शन करें तो जनता को भी यह महसूस होने लगता है कि शायद कभी हमारी भी बारी आएगी जब हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार हमारे बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़क पर उतरेगी। आमतौर पर या कहें तो खासतौर पर भी भारतीय राजनीति में यह परिदृश्य परिलक्षित नहीं होता की सत्ताधारी लोग जनता के सुविधाओं और उन से किए वादों को पूरा करने के लिए सड़क पर बैठते हों। जो सत्ताधीशों की महती जिम्मेदारी भी है। इससे परे जब जनता के मुद्दों को आवाज बना कर देश का चौथा स्तंभ अर्थात मीडिया, सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता जब किसी मामले, प्रकरण, जनता को होने वाली कठिनाई, समस्याओं को लेकर जब चुनी हुई सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं तो ऐसे लोगों की आवाज न केवल दबाई जाती है, अपितु ऐन केन प्रकारेण झूठे प्रकरण और अन्य तरीकों से प्रताड़ित भी किया जाता है। बातें होती हैं सामाजिक सुरक्षा की, पत्रकार सुरक्षा की, पर बातें हैं…..बातों का क्या??
वैसे तो राजनीति अर्थ होता है ‘राज करने की नीति’ लेकिन सच में देखें तो राजनीति के साथ राज करने की नीति कम और आईना दिखाने वालों को दाद खाज करने की नीति ज्यादा है। किन्तु इनके दाद खाज का प्रभाव पड़ता है जनता पर और जनता इनकी नौटंकी को भली भांति देखती है। भांति भांति प्रकार से देखते हुए जनता भांति भांति प्रकार के नेता फिर से चुनती है। पर चुनने के बाद नेता फिर से एक ही थाली के चट्टे बट्टे हो जाते हैं।
फिर नेता जनता के दांत खट्टे कर देते हैं। जनता आशा के साथ फिर इनको देखती है और प्रिय नेता आशा के साथ ही जनता को देखने रहने देते हैं। अब आशा के साथ देखना जनता की आदत बन चुकी है। कभी कभी तो यह भी लगता है। जनता भी विकास प्रेमी ना होकर, पार्टी प्रेमी हो गयी है। पार्टी प्रेम भी ऐसा सोशल मीडिया पर देश/राज्य के सम्मानीय पदों पर आसीन नेताओं को गाली दी जाती है। खैर गाली तो नेताओं का आभूषण है। और जनता यह आभूषण समय समय पर नेताओं को पहनाती रहती है।
फिर भी पक्ष हो या विपक्ष…. राजनीति में कभी कोई भूखा नही मरता। आपने शायद ही कभी राजनेताओं की फटेहाली देखी-सुनी होगी। हां जनता की स्थिति में आज तक कोई सुधार नहीं हुआ। इसीलिए भारतीय राजनीति के व्यवसाय में निवेश करते हुए (वोट डालते हुए) इससे जुड़े जोखिमों को ध्यानपूर्वक समझ लें। निवेश का लॉक-इन पीरियड 5 साल का है। कोई जरूरी नहीं है कि राजनीतिक कंपनियां ‘रिटर्न’ के जो वादे कर रही हैं, वो सही हो। आपके निवेश (वोट) पर रिटर्न (आपसे किए वादों की पूर्ति) बाजार की स्थिति (तात्कालिक मुद्दों और सरकार की वित्तीय स्थिति) पर निर्भर है। 5 साल से पहले अगर कंपनी कोई बड़े नीतिगत बदलाव करती है, तो आपका पूरा निवेश (वोट की शक्ल में पार्टी में जताया गया भरोसा) डूब भी सकता है। मेडिकल साइंस ने भले ही कितनी तरक्की कर ली हो उसके पास उन रहस्यमयी और शिथिल कर देने वाले मर्ज़ का इलाज नहीं है, जिसने भारत की सियासी पार्टियों के नुमाइंदों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।