बैकुंठपुर@शिकायत के दो महीने बाद भी जपं उपाध्यक्ष पति पर मामला दर्ज नहीं

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खबर प्रकाशित कर मामला उजागर करने वाले पर एक दिन में मामला पंजीबद्ध?
सत्ता पक्ष के इशारों पर पुलिस कर रही काम,वायरल चैट मामले में दोषी से कोसो दूर है,पुलिसवहीं मामले में खबर लिखने वाले पर कार्यवाही, वाह रे !! कोरिया पुलिस।
सतापक्ष का जिस पर हो आशीर्वाद उस पर मामला पंजीबद्ध करने से डरती है पुलिस,अन्य मामला में तत्काल पंजीबद्ध कर लेती है पुलिस?
क्या न्याय सत्ता पक्ष के इशारों पर होगा या फिर पुलिस कर पाएगी अपना स्वतंत्र काम?
कोरिया पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार उठ रहे सवाल,संदेह के घेरे में पुलिस प्रशासन की कायशैली।
कोरिया की ईमानदार पुलिस ही जाने आखिर चल क्या रहा उनके मन में, क्योंकि इनके नजर में आम लोग ही चोर है और यह खुद पाकसाफ।
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,13फ रवरी 2022(घटती-घटना)
। कोरिया पुलिस प्रशासन जिस प्रकार काम कर रहा है उससे वह खुद संदेह के घेरे में खड़ा है जहां एक तरफ 2 महीने से एक पीड़ित जनपद बैकुंठपुर उपाध्यक्ष पति के खिलाफ शिकायत करके मामला पंजीबद्ध कराने पुलिस अधीक्षक सहित कई लोगों से गुहार लगा चुका है पर पुलिस उस पर मामला पंजीबद्ध नहीं कर पा रही क्योंकि वह व्यक्ति सत्तापक्ष से जुड़ा हुआ है इसलिए पुलिस भी उस पर अपराध पंजीबद्ध करने से डर रही है, पर वही एक दूसरा मामला जहां खबर प्रकाशन कर एक मामले को उजागर किया जाता है उस पत्रकार के खिलाफ पुलिस खुद प्रार्थी बनकर एक दिन में ही अपराध पंजीबद्ध कर एट्रोसिटी एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं लगा देती है। इससे यह समझा जा सकता है की पुलिस अपराध पंजीबद्ध करने से पहले उस व्यक्ति के पीछे किस सत्तापक्ष का हाथ है वह किसका समर्थक है इन सब चीजों को देखकर ही आगे बढ़ती है पर अन्य लोगों पर मुकदमा दर्ज करने पर तनिक भी देर नहीं करती चाहे वह मामला झूठा क्यों ना हो, पर जहां मामला सच्चा होता है वहां पर राजनीतिक वह सत्ता पक्ष के लोगों का मुंह देखती है।
ज्ञात हो कि 14 दिसंबर 2021 को चिरगुड़ा सरपंच पति लाल बहादुर सिंह जो एक आदिवासी समुदाय से आता है उसके द्वारा जनपद उपाध्यक्ष पति शिक्षक महेश साहू पर आरोप था की उनके द्वारा जातिगत गाली गलौज की गई है पर 2 महीने बाद भी पुलिस द्वारा इस पर मामला पंजीबद्ध नहीं किया गया, वहीं पीड़ित लाल बहादुर सिंह का कहना है महेश साहू राजनीतिक संरक्षण के साथ ऊंची पकड़ रखते है, यही वजह है कि पुलिस मामला पंजीबद्ध करने में घबरा रही है स्थानीय विधायक से लेकर सत्ता पक्ष तक इनकी संरक्षण में लगा हुआ है। यही कारण है कि वह अपना मूल काम छोड़कर धड़ल्ले से राजनीति का कार्य कर रहे है। शिकायकर्ता के अनुसार इनके द्वारा अपने शिक्षकीय पद का दुरूपयोग करते हुये राजनीती में ज्यादा मसगुल रहते है और अपने ही पत्नी को उपाध्यक्ष के सारे काम देखते है साथ इनके द्वारा पंचायतों में ठेका का काम इनके संरक्षण में चल रहा है। शिकायतकर्ता लाल बहादुर सिंह के मामले में पुलिस महेश साहू पर मामला पंजीबद्ध करने में हाथ कांपते नजर आ रहे है। लाल बहादुर सिंह का यह भी मानना है कि मैंने इस मामले में पुलिस अधीक्षक से भी गुहार लगायी है जिस पर मुझे सिर्फ आश्वासन ही मिला पर दो महिने बीतने को है कार्यवाही सुनिश्चित नहीं हो सकी। वहीं मेरे मामले में खुद महेश साहू द्वारा गावं के सदस्यों को यह बोला जाता है कि मेरा कुछ नहीं हो सकता मेरे पीछे बड़े लोगों का हाथ है।
पुलिस ने पत्रकार मामले में त्वरित मामला पंजीबद्ध कर रचा इतिहास या निकाली है अपनी खुन्नस ?
क्षेत्र में पत्रकार के ऊपर त्वरीत मामला पंजीबद्ध होने से पुलिस की किरकिरी जमकर हो रही है और यह कहा जा रहा है कि पहली बार ऐसा देखा गया है जब पुलिस एक दिन में ही अपने आप को पाक साफ बताने के लिए पत्रकार पर मामला पंजीबद्ध कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं पर वही कई ऐसे मामले हैं जिस पर पुलिस मामला पंजीबद्ध नहीं करती प्रार्थी को घुमाती रहती है। ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी थी जब पुलिस ने बिना जांच किए पत्रकार पर मामला पंजीबद्ध कर लिया? यह पुलिस के लिए एक बड़ा सवाल है। जिसका जवाब शायद पुलिस के पास भी नहीं है यही वजह है कि पुलिस भी मामले में जवाब तलाश रही है और जुगाड़ में है कि कोई अन्य आकर पत्रकार के खिलाफ पुलिस का सहयोग करे,ं पुलिस अंदर से ही पत्रकार को फंसाने के लिए कुछ लोगों वह राजनीतिक सत्ता पक्ष का सहारा ले रही है आखिर पुलिस क्यों अपना आपा खो बैठी है और अपनी किरकिरी कराने पर क्यों तुली है?
क्या कोरिया पुलिस साइबर की प्रयोगशाला में वायरल व्हाट्सएप चौट की जांच करवा पाएगी या
खुद कहेगी फर्जी?-

कोरिया पुलिस सही दिशा में जांच ना करके अपनी किरकिरी तो करा चुकी है क्या कोरिया पुलिस अपने लिए इस वायरल चैट की जांच साइबर की प्रयोगशाला में करा पाएगी? या फिर खुद फर्जी कहते हुये मामले का पटाक्षेप करेगी। सत्यता या फर्जी का सर्टिफिकेट कौन देगा पता नहीं। प्रमाण पत्र के साथ यह बता सके कि चैट आखिर असली है या फर्जी ? अब तक तो फर्जी मानकर ही कार्यवाही की दिशा निर्धारित कर चुकी है। इसके पीछे की वजह क्या है यह तो कोरिया की ईमानदार पुलिस ही जाने। क्योंकि इनके नजर में आम लोग ही चोर है और यह खुद पाकसाफ है। वायरल चैट मामले में प्रथम दृष्टया तो शामिल पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही होनी चाहिए थी पर उन्हें बचाने और किसी का किया धरा पत्रकार के सर मढ़ने का काम जरूर देखा जा रहा है। ना तो उन पुलिसकर्मियों को हटाया गया, ना ही पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हुई, जबकि पुलिसकर्मी ही पत्रकार पर कार्यवाही कर जांच को अलग ही दिशा में ले गए है।
आदिवासी समुदाय के लोग भी पत्रकार की कार्यवाही को लेकर आश्चर्यचकित है
आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी व पदाधिकारी की माने तो वायरल चैट मामले में वह शुरू से अंत तक सबकुछ देख रहे और मामले को समझ भी रहे हैं। उनका भी यही कहना है कि पत्रकार पर कार्यवाही समझ से परे है। इस पूर मामले में पत्रकार ने दायित्व का निभाते हुये वहीं अपनी लेखनी में कहीं भी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया और ना ही उसने किसी को भड़काने की कोशिश की है। सही में यदि कारवाही किसी पर होनी थी तो वह उस व्हाट्सएप चैट से संबंधित लोगों पर होनी थी और ना जाने पुलिस क्या समझ कर पत्रकार पर कार्यवाही कर बैठी है? उनका यह भी मानना है क्या इस खबर का प्रकाशन नहीं होता तो क्या पुलिस उन लोगों पर कार्रवाई करती जिसने व्हाट्सएप ग्रुप में व्हाट्सएप चैट को वायरल करके पुलिस को ही चुनौती दी थी, पर ऐसा नहीं दिखा खबर प्रकाशन होने पर इन्होंने उन लोगों को छोड़कर पत्रकार को ही दोषी मान बैठा है।
समुदाय के कुछ लोग पत्रकार के समर्थन में खड़े
आदिवासी समुदाय के कुछ लोग जिन्होंने खबरों को पढ़ा है, और समझा है उससे वह पत्रकार की गलती नहीं मान रहे और पत्रकार के साथ हुई कार्यवाही को लेकर वह भी दुखी है और अपनी तरफ से यह प्रयास कर रहे हैं की कार्यवाही उन लोगों पर हो जो वाकई में इसका दोषी है। पत्रकार को जिस प्रकार मामले को उजागर करने पर कार्रवाई की जा रही है यह समझ के परे।
पत्रकार पर एफआईआर करने की आखिर ऐसी क्या थी जल्दी?’
पुलिस ने जिस प्रकार पत्रकार पर एफआईआर दर्ज किया उससे ऐसा लगा कि पुलिस पत्रकार पर एफआईआर दर्ज करने का इंतजार काफी समय से कर रही थी। जैसे ही खबर का प्रकाशन हुआ वैसे पुलिस को लगा कि अब जांच उनके कर्मचारियों पर होगी उससे बचने के लिए पत्रकार पर ही एफआईआर दर्ज करना सही होगा, यही मानकर पत्रकार पर एफआईआर दर्ज करने में बिल्कुल भी देरी नहीं की। तत्काल उसको पकड़ने व गिरफ्तार करने में जुट गयी। यही वजह थी कि मामले की जांच करे बगैर पुलिस निर्णय लेकर बैठी थी, ऐसा लग रहा था कि जांच करना जरूरी नहीं पहले फटाक से मामला बनाओ और उसे जेल भेजो ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा। इसी अंदाज में पुलिस ने तत्काल एफआईआर दर्ज कर मामले का मुख्य आरोपी पत्रकार को बनाकर अपने ही फजीहत करा ली है। यहां तक इस मामले में पुलिस का व्यवहार ऐसा देखने को मिला जो किसी आदतन अपराधी के लिये दिखायी देता है।


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